४८६. टिप्पणियाँ
विद्यार्थी और हड़ताल
यह हड़ताल जैसे-जैसे लम्बी खिंचती जा रही है, वैसे-वैसे विद्यार्थियों की कसौटी होती जा रही है। उनका आजतक दृढ़ बने रहना उन्हें शोभा देता है और इससे देश आगे बढ़ता है। अब मेरी इच्छा उनसे यह कहने की हो रही है कि वे कोई काम करना शुरू कर दें। वे अहमदाबाद की गलियों की सफाई क्यों न करें? या इसी प्रकार की अन्य दूसरी सेवाएँ क्यों न करें। उन्हें मन में विश्वास रखना है कि आगे-पीछे वे अन्त में इसी कालेज में सम्मानपूर्वक जायेंगे। प्रसंग तो ऐसा आ रहा है कि प्रिन्सिपल महोदय को ही कालेज छोड़ना पड़ सकता है। इतनी शक्ति पाने के लिए विद्यार्थियों को सेवा कार्य में जुट जाना चाहिए। कांग्रेस का प्रस्ताव है कि खादीके मारफत विदेशी कपड़े का बहिष्कार किया जाये। क्या वे विदेशी कपड़ों का उपयोग बन्द करेंगे? क्या वे दूसरों के पास जा-जाकर विदेशी कपड़ा जमा नहीं करेंगे? क्या वे स्वयं खादी पहनेंगे और क्या वे खादी की फेरी लगायेंगे? ये सारे सवाल विद्यार्थियों के लिए विचारणीय हैं।
मौन कताई
एक यज्ञार्थ कातनेवाले लिखते हैं :
ता० २२-१२-१९२८ के 'नवजीवन' में आपने लिखा है कि चरखा चलाते समय मौन धारण करना चाहिए। आप कातते समय मौन धारण के बदले भजन गाने या रामनाम रटने की सलाह क्यों नहीं देते? किसान रहट चलाते-चलाते जब भजन की तान छेड़ता है तो वह कितनी सुन्दर लगती है?
प्रस्तुत लेखक ने मौन का जैसा अर्थ किया है वैसा कोई करेगा, यह बात मैंने नहीं सोची थी। मौन से मेरा आशय तो यह था कि पास बैठनेवालों से व्यर्थ की गपशप न की जाये। मौन धारण करने वाला मन ही मन राम भजन न करे, यह कहने का तो मेरा आशय था ही नहीं। जो इस तरह मन में राम-नाम न ले सके वह भले ही जबान से लेता रहे। ऊपर रहट का उदाहरण दिया गया है; इसलिए थोड़ा स्पष्टीकरण कर देना जरूरी समझता हूँ। रहट चलाने वाला किसान जो भजन गाता है उसका प्रभाव संस्कारी श्रोता पर अच्छा पड़ता है, लेकिन यह नहीं मानना चाहिए कि किसान पर भी ऐसा ही असर होता है। जिस समय जीभ अभ्यास वश भजन गाती है उस समय मन दूसरे घोड़ों पर सवार होकर जाने कहाँ की सैर करता रहता है। इसलिए कातते समय केवल जबान से ही भजन गाते रहने से हमारा फर्ज पूरा नहीं हो जाता। जब अटूट रूप से जबान का सम्बन्ध दिल के साथ जुड़ जाता है तब
१. अंशतः उद्धृत ।