मैं उसे ठीक मान लूँ। यह दुःख की बात है कि छगनलाल की तुम्हारे साथ नहीं पटती। इसमें तुम्हारा भी, फिर चाहे अनजाने ही सही दोष तो है ही। उसको लिखे तुम्हारे पत्र अग्नि को शान्त करने वाले नहीं होते। किन्तु छगनलाल की तुम्हारे साथ नहीं बनती इस बात को एक ओर रखें तो मुझे उसमें गुण ही गुण दिखाई देते हैं और मैं दिन- प्रतिदिन उनमें वृद्धि ही देखता हूँ। इसमें मुझसे कहाँ भूल हुई है यह मुझे लिखकर बताना अथवा जब आओ तब बताना। मैं यहाँ ३१ तारीख तक रहूँगा।
बापू के आशीर्वाद
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो : श्री नारणदास गांधी ने
४९०. पत्र : मीरा बहन को
[ २७ जनवरी, १९२९ के बाद ]
चि० मीरा, तुम्हारे पत्र मिल गये । गुरुदेव का पत्र बड़ा सुन्दर है; दूसरा पत्र भी। तुम वहाँ बड़े ठीक समय पर पहुँची और काम भी तुमने बड़े अच्छे ढंगसे किया।
तुमने अपना वजन बहुत ज्यादा घटा लिया है। लेकिन पूर्णतः स्वस्थ होने पर, समझदारी से पथ्य लेकर पहले जितना वजन बढ़ा लेने में तुमको कोई कठिनाई नहीं पड़ेगी।
फलों के बिना ही मेरा आधा पौंड वजन बढ़ गया है। देखना है, अब सिन्ध-यात्रा के दौरान कितना कुछ कर पाता हूँ।
तुम जो भी काम करो, आराम से ही करना, तेजी से नहीं, तुमको अपने हाथ-पैर और अपना उदर-भाग गरम रखना चाहिए। हमेशा थोड़े गरम आसन पर ही बैठने का ध्यान रखो और इसीलिए जहाँ भी जाओ अपने साथ एक मोटा आसन अवश्य ले जाओ।
नारणदास को खादी-भण्डार से हटा लिया गया है। उसको केवल महिलाओं की कक्षाएँ चलाने का काम ही दिया जायेगा। यह है तो एक संयोग ही, पर विपत्ति के रूप में यह वास्तव में एक वरदान है। कृष्णदास गांधी हरजीवन की मदद करने और स्वयं स्वास्थ्य लाभ के लिए कल कश्मीर रवाना हो गया।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी जी० एन० ९३९३ से; तथा सी० डब्ल्यू० ५३३८ से भी।
सौजन्य : मीराबहन
१. अन्तिम पैरा में नारणदास गांधी के उल्लेख से; देखिए पिछला शीर्षक ।
२. हरजीवन कोटक, जिन्होंने कश्मीर में अखिल भारतीय कताई संघ की एक शाखा स्थापित की थी।