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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/४८४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

भाषाओं का स्थान कतई नहीं लेना है; उसे तो अन्तर्प्रान्तीय विचार-विनिमय का माध्यम बनना है और सभी अखिल भारतीय संगठनों की अधिकृत भाषा का ही स्थान लेना है। कहने की जरूरत नहीं कि हिन्दी की उर्दू शैली उससे जुड़ी हुई है, अलग नहीं। [अंग्रेजी से]

यंग इंडिया, ३१-१-१९२९


५००. टिप्पणियाँ

विद्यार्थियों की हड़ताल¹

गुजरात महाविद्यालय, अहमदाबाद के विद्यार्थियों की हड़ताल अभी तक पूरे जोश के साथ जारी है। विद्यार्थी जिस दृढ़ता, शान्ति और संगठन का परिचय दे रहे हैं वह हर तरह तारीफ के काबिल है। अब वे अपनी ताकत का अनुभव करने लगे हैं। मेरा तो यह भी विचार है कि अगर वे कोई रचनात्मक काम करने लगें तो उन्हें अपनी ताकत का और भी ज्यादा पता चलेगा। मेरा विश्वास है कि हमारे स्कूल और कालेज हमें बहादुरी सिखाने के बदले खुशामदी, डरपोक, ढुलमुल मिजाज, और चरित्र-गठन करने वाले गुणों से हीन बनाते हैं। मर्दानगी किसी को दुतकारने, डींग हाँकने या बढ़प्पन जताने में नहीं होती। वह तो सच्चे काम को करने का साहस बतलाने में और उस साहस-के फलस्वरूप सामाजिक, राजनैतिक या दूसरे मामलों में जो कुछ कठिनाइयाँ पेश हों उन्हें झेल लेने में होती है। मनुष्य की मनुष्यता उसके कामों से प्रकट होती है, शब्दों से नहीं। अब जो परिस्थिति बनी है, जान पड़ता है, उसमें विद्यार्थी वर्ग को बहुत लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अगर स्थिति ऐसी ही बनी रहे तो उन्हें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। तब तो सर्वसाधारण जनता का यह काम होगा कि वह इस मामले में दस्तन्दा जी करके उसे सुलझाने की कोशिश करे। और उस हालत में तो यह भारत-भरके विद्यार्थी-जगत का भी कर्त्तव्य बन जायेगा कि वह अपने अधिकार को जो पूरी तरह से न्याय्य है, पाने के लिए लड़े। जो लोग इस मसले को पूरी तरह जान लेना चाहते हैं उन्हें इस हड़ताल से सम्बन्धित सभी कागजों की नकल श्री मावलंकर से मिल सकेंगी। अहमदाबाद के विद्यार्थियों की लड़ाई सिर्फ उनके अपने हकों की लड़ाई नहीं है, वे तो सर्व-साधारण विद्यार्थी-जगत के सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इसलिए, एक तरह यह लड़ाई राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए भी लड़ी जा रही है। अहमदाबाद के विद्यार्थियों की तरह साहस के साथ लड़नेवाले हर तरह से जनता की पूरी मदद के पात्र हैं।

मुझे पक्का भरोसा है कि अगर विद्यार्थी किसी राष्ट्रीय रचनात्मक कार्य में लग गये तो उन्हें जनता की मदद भी अवश्य ही मिलेगी। राष्ट्रीय काम करने से वे कुछ भी खोयेंगे नहीं। अगर यह उन्हें पसन्द न हो तो जरूरी नहीं है कि वे कांग्रेस के कार्य-


१. देखिए “भाषण : गुजरात कालेज के विद्यार्थियों के समक्ष”, ३०-१-१९२९ ।