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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/४९१

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५०६. पत्र : मोतीलाल नेहरूको

आश्रम
साबरमती
१ फरवरी, १९२९

प्रिय मोतीलालजी,

आपका तार मिल गया । यूरोप यात्राके बारेमें मैंने 'यंग इंडिया' में जो लिखा था आपने पढ़ ही लिया होगा।¹ इसलिए यहाँ उन कारणोंको बतलानेकी जरूरत नहीं जिनके आधारपर मैंने ऐसा निर्णय किया था । अन्तिम रूपसे निर्णय करते ही मुझे ऐसा लगा जैसे सिरसे एक बोझ उतर गया हो। और आपके तारने मेरे निर्णय पर मुहर लगा दी है।

सिन्ध यात्राका कार्यक्रम मैंने जवाहरको भेज दिया था । उसने आपको दिखला भी दिया होगा । लेकिन बातको और पक्की करने के ख्यालसे उसकी एक प्रति मैं आपके पास भी भेज रहा हूँ । उस प्रान्तमें मौसम खराब हो जानेसे मुझे कल रवाना होनेसे रोक दिया गया था। इसलिए तारीखोंमें कुछ बदलाव कर दिया गया है। अब मैं कल सुबह रवाना हो रहा हूँ ।

मैं इसके साथ संतानम्‌का पत्र नत्थी कर रहा हूँ । सारी बातें पत्रसे ही बिलकुल साफ समझ में आ जाती हैं। मैं चाहता हूँ कि आप पंजाबके कार्यकर्त्ताओंको बुलाकर उनके मतभेदोंका कुछ निबटारा करा दें । हम अगर सचमुच काम करना ही चाहते हैं तो अगला कांग्रेस अधिवेशन बिलकुल सच्चा और खरा -- एक ऐसा समारोह होना चाहिए, जो वास्तवमें निर्वाचित प्रतिनिधियोंका सही प्रतिबिम्ब हो | हवालेके लिए मैं 'यंग इंडिया' के उस अंककी एक चिन्हित प्रति आपके पास भेज रहा जिसमें एक प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीका पत्र प्रकाशित किया गया है। पत्र में सच्ची घटनाएँ बयान की गई हैं । उसे देखकर आप बड़ी आसानीसे अनुमान लगा लेंगे कि वह पंजाबके बारे में है। पंजाब के कार्यकर्त्ताओंकी भावनाओंके ख्यालसे मैंने उसमें नाम मिटा दिये हैं । उस पत्रसे पता चलता है कि बंगालके कांग्रेस अधिवेशनमें पूरा का पूरा प्रतिनिधि मण्डल ही जाली था । आन्ध्रकी घटनाओंकी तफसील जब पट्टाभि सुना रहे थे, तब तो आप खुद मौजूद ही थे । यदि कांग्रेसके सभी 'रजि- स्टरों' की जाँच की जाये, तो बड़ी ही शोचनीय स्थिति सामने आयेगी । मैं चाहता


१. देखिए “क्षमा-प्रार्थना, ३१-१-१९२९ ।
२. देखिए "इस तरह नहीं ", ३२-१-१९२९ ।
३. पट्टाभि सीतारमैया ।