५११. एक युवककी समस्या एक पाटीदार युवक लिखता है : " ऐसा संकट बहुत-से युवकोंके सामने आया दिखाई देता है । बाईस वर्षका जवान तो शास्त्रोंके अनुसार माता-पिताके लिए मित्र समान माना जा सकता है। उसके ऊपर बलात्कार नहीं हो सकता । किन्तु आजकल माता-पिता मानते हैं कि चाहे पुत्र कितनी बड़ी उम्रका हो गया हो वह उनके विचारके अनुसार चलनेके लिए बद्ध है । विशेष- तया विवाहादि कामोंके सम्बन्धमें । और यदि अधिकांश माता-पिता पुत्रके लिए ऐसी मान्यता रखते हों तो कन्याओंका तो कहना ही क्या ? ऐसे कठिन प्रसंग में तो मुझे लगता है कि ठीक आयु प्राप्त करनेपर लड़कों या लड़कियोंका यही कर्त्तव्य है कि वे अपनी अन्तरात्माके कहे अनुसार चलें । ऐसा करनेका उन्हें अधिकार तो है ही । माता-पिता क्लेश करेंगे, इससे डर जानेकी कोई बात नहीं है । मैंने अनुभवसे यह देखा है कि जहाँ पुत्र या कन्या न्यायके मार्गपर हो और अपने निर्णयके विषयमें पूर्णतया दृढ़ रहें वहाँ क्लेश नहीं होता अथवा हो भी तो कमसे कम होता है । अपनी सन्तानके निश्चयको जब माँ-बाप समझ जाते हैं तब शान्त होकर बैठ जाते हैं । क्लेशके पीछे अपनी इच्छा मनवानेकी आशा हमेशा छिपी रहती है । यह आशा निर्मूल हो जानेपर क्लेश करनेका कोई आधार ही नहीं रह जाता। इसलिए प्रस्तुत पत्रके लेखक घरमें चाहे जितना क्लेश हो तो भी वह एक बच्ची के साथ विवाह करनेका पाप न करें, साटा करनेके बुरे रिवाजको न मानें, उपजाति से बाहर विवाह करनेमें पुण्य समझें और यह विश्वास रखें कि 'नवजीवन' में मैंने विधवा-विवाह के बारेमें जो मर्यादाएँ बताई थीं उनको मानते हुए विवाह करना परोपकार होगा । इस पाटीदार युवकको ठीक शिक्षा प्राप्त हुई है । उसमें अच्छा-बुरा सोचनेकी शक्ति है। ऐसे युवकके लिए जैसा ऊपर बताया है वैसे संकटमें से निकल जानेमें जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, ३-२-१९२९ १. यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इस २२ वर्षीय युवकने लिखा था कि 'साटा' की प्रथा माने बिना उसका विवाह नहीं हो पा रहा है । बाल-विवाहका प्रचलन होनेके कारण दस सालकी लड़कीसे उसका विवाह हो सकता है। माता-पिता दूसरी जातिमें या विधवासे विवाहकी बात नहीं मानते इसलिए उसे क्या करना चाहिए।
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/४९७
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