परिशिष्ट परिशिष्ट १ डा० विधानचन्द्र रायका पत्र शिलांग २८ अक्तूबर, १९२८ प्रिय महात्माजी, मैंने कुछ महीने पहले आपको कांग्रेसके ४३ वें अधिवेशनके समय की जानेवाली प्रदर्शनी के सम्बन्ध में आपकी हिदायतें जाननेके लिए पत्र लिखा था। मैं मानता हूँ कि मुझे आपकी ओरसे ऐसी स्पष्ट हिदायतें नहीं मिलीं जिनपर हम अमल कर सकें; आपका पत्र अस्पष्ट था और उसकी भाषामें सतर्कता थी । कृपया अब (आशा है, अब भी समय है) आप मुझे हिदायतें भेज दें। यदि आप मुझे ठीक-ठीक सूचित कर दें कि कलकत्ता कमेटीके कौनसे निर्णय हैं जिन्होंने आपको संकोच में डाल दिया है तो मैं आपका बड़ा आभार मानूँगा । कलकत्तासे रवाना होनेके थोड़े ही पहले श्री खण्डेलवालने मुझे बतलाया था कि आप कांग्रेस अधिवेशनके दिनोंमें कलकत्ता आनेका निश्चय नहीं कर पाये हैं । कलकत्ता कांग्रेस कमेटीने अबतक ये निर्णय लिये हैं ( मैं इन्हें याददाश्त के बल पर लिख रहा हूँ) : १. विदेशी सूतसे बने सूती वस्त्र या किसी दूसरे देशमें बनी किसी वस्तुको प्रदर्शनीमें नहीं रखा जायेगा; २. ऐसी वस्तुओंके विज्ञापनोंकी अनुमति नहीं दी जायेगी; ३. किसी भी तरह के ब्रिटिश मालको प्रदर्शनी में रखनेकी अनुमति नहीं दी जायेगी; ४. ऐसे मालके विज्ञापनकी अनुमति नहीं दी जायेगी; ५. कुटीर उद्योगोंके लिए उपयोगी (गैर-ब्रिटिश) छोटी-छोटी मशीनें प्रदर्शित की जा सकेंगी। ६. मिलके बने वस्त्रोंको प्रदर्शनीमें रखनेकी अनुमति तभी दी जायेगी जब कमेटीको पक्का यकीन हो जाये कि वे भारतीय सूतके बने हैं । कमेटीने ये निर्णय तो लिये हैं, लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि यदि हमें पता चल जाये कि इनमें से किसी भी निर्णयपर आपको आपत्ति है तो कमेटीका कोई भी सदस्य इनमें से किसी एक या अनेक शतके पालनका आग्रह नहीं करेगा ।
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/५०१
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