प्रिय महात्माजी, परिशिष्ट २ शौकत अलीके पत्रके कुछ अंश . सुलतानी मैन्शन डोंगरी, बम्बई २३ अक्तूबर, १९२८ आपका २४ सितम्बरका पत्र मुझे ठीक वक्तपर मिल गया था । समाचारपत्रोंके लेखोंसे मुझे पता चला है कि लोगोंको मेरे खिलाफ भड़कानेके लिए आपका नाम इस्तेमाल किया जा रहा है। .. कोहाट सम्बन्धी हमारे मतभेदों और कुछ अन्य बातोंका भी उल्लेख किया जा रहा है। इसलिए मुझे यह जानकर आश्चर्य नहीं हुआ कि महादेवने शिमलामें भी उसकी कुछ चर्चा सुनी। मैंने आपके बारेमें जो भी कुछ कहा था वह मैं आपको बतला रहा हूँ। और मैं आपको आश्वस्त कर दूं कि घटनाका जो ब्योरा मैं आपको लिख रहा हूँ उसकी बिना सिर्फ मेरी अपनी याददाश्त नहीं है; शुएबको भी यह बात काफी अच्छी तरह याद है; और डा० अन्सारी, यहाँतक कि पण्डित मोतीलाल मी, मेरे इन तथ्योंको गलत नहीं कह सकते। अम्बालाल साराभाईके यहाँ पण्डितजीके साथ सचमुच मेरी कसकर झड़प हो गई थी और नौबत जैसे हाथापाई तक पहुँचनेवाली थी, क्योंकि हम ।.. अपरिवर्तनवादियों" को जब वे मेरे सामने ही जी भर कर बुरा-भला कहने लगे तो मेरा खून खौलने लगा था ।... आपने उनको माफ कर दिया है और आप उनकी ज्यादतियोंको शायद भूल भी चुके होंगे; लेकिन हममें से अधिकांश तो ऐसा नहीं कर सकते । आपके क्षेत्र अनेक हैं, इसलिए आप तो सक्रिय राजनीतिसे अवकाश ग्रहण भी कर सकते हैं, लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हम ऐसा नहीं कर सकते; और मुझे तो अपने मुसलमान भाइयोंको अंग्रेजोंके फन्देमें पड़नेसे बचाना ही पड़ेगा, नहीं तो वे बिलकुल ही खतम हो जायेंगे और उससे इस्लामको बहुत नुकसान पहुँचेगा; फिर मैंने अपना समूचा जीवन इस्लामकी सेवाके लिए अर्पित कर दिया है।... श्रीनिवास आयंगारको मैंने हमेशा पसन्द किया है । पसन्द वे भावुक व्यक्ति हैं; किन्तु उनके मनमें दुराव-छिपाव नहीं रहता; यह भी सम्भव है कि वे बातपर अड़े न रहें; पर वे सच्चे और अच्छे स्वभावके व्यक्ति हैं। मैं नहीं कह सकता कि मद्रासके प्रस्तावका विरोध पण्डितजीने केवल इसलिए किया या नहीं कि प्रस्ताव श्री आयंगारकी ओरसे आया था। सर्वदलीय परिषदके साथ मेरा सम्पर्क पहली बार पिछले वर्ष मईके महीने में बम्बई में ही हुआ था और आप जानते ही हैं कि आपकी मौजूदगी में ही मोतीलालजी और मेरे बीच कैसा तीव्र मतभेद खड़ा हो गया था ।... मुसलमानोंके लिए 'स्थान' सुरक्षित करनेके प्रश्नके विरोध में उन्होंने बड़ी दृढ़तासे
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/५०३
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