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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/५३

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टिप्पणी

करती रहेगी तो उसकी किश्ती अपने-आप ही डूब जायेगी। इसलिए मैं आशा करता कि लोग तनिक भी मर्यादा भंग नहीं करेंगे और अपने नेताओंके शान्ति बनाये रखने के आदेशोंका पूरी तरह पालन करेंगे।

मैं लालाजीको बधाई देता हूँ। वर्षोंसे वे पंजाब केसरीके रूपमें विख्यात हैं। इस बार उनकी इस उपाधिको शोभान्वित करनेमें सरकारी पुलिसने भी हाथ बँटाया है और लालाजीने जो देशसेवा की है, इस आक्रमणसे इसमें और भी वृद्धि हुई है।

इस लेखको लिखनेके बाद मुझे लालाजीका यह तार[] मिला है।

[गुजराती से]

नवजीवन, ४-११-१९२८

२०. टिप्पणी

एक उलझन

एक मित्र लिखते हैं:

आप तो कहते हैं कि शरीरके रहते हुए अहिंसाका सम्पूर्ण पालन असम्भव है। देहधारीसे तो कहीं-न-कहीं हिंसा होती ही रहेगी। हिंसा के बिना उसका शरीर कायम ही नहीं रह सकता। फिर आप अहिंसाको धर्म क्यों कहते हैं? जिसका पूर्ण रूपसे पालन न हो सके वह धर्म कैसे कहा जा सकता है?

मेरी विनम्र सम्मतिमें तो जिसका इस शरीरसे पूर्णतः पालन किया जा सकता है, वह धर्म हो ही नहीं सकता। श्रद्धाके बिना धर्मकी परीक्षा नहीं होती, हो ही नहीं सकती। और यदि इस अपूर्ण, क्षणभंगुर शरीरमें रहकर भी मनुष्यके लिए पूर्णता प्राप्त करना सम्भव हो तो श्रद्धाके लिए कोई स्थान ही न रह जाये। आत्माका गुण अनन्त माना गया है। यदि इस देहसे पूर्णता सम्भव हो तो उससे आत्माकी अनन्तताके गुणका खण्डन होता है। यदि इस देह से पूर्णता प्राप्त करना सम्भव होता तो आज कर्त्तव्याकर्त्तव्यका अन्वेषण करनेके लिए जो ऊहापोह करनी पड़ती है, वह करनी ही न पड़े; क्योंकि किसी एक पूर्ण उदाहरणको देखकर सभी उसीके अनुसार चलने लगें। यदि इस शरीरसे पूर्णता प्राप्त करना सम्भव होता तो आज लोग अलग-अलग सम्प्रदायोंके बजाय किसी एक ही सर्वसामान्य धर्मपर चलते होते।

आदर्शकी आदर्शता उसकी अनन्ततामें, अर्थात् उसकी दूरस्थतामें निहित है। आप उसके चाहे जितने निकट जाइए, वह तो दूरका दूर ही रहता है। और फिर भी वह निकट ही है; क्योंकि उसके अस्तित्वके सम्बन्धमें, उसके सत्यके विषयमें हमारी श्रद्धा अविचल होती है। यह श्रद्धा ही हमारा जीवन है, सर्वस्व है।

  1. तार यहाँ नहीं दिया गया है; देखिए "अवश्यंभावी", ८-११-१९२८। लालाजीने लिखा था कि लोग सर्वथा निर्दोष थे और उनपर जान-बूझकर आक्रमण किया गया था। उन्हें दो गहरी चोटें लगी हैं, किन्तु वे चिन्ताजनक नहीं हैं।