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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/५५

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विचारकी कीमिया

होनेवाली थोड़ी-सी आय। श्री नगीनदासके हिसाबसे गाय-भैंसोंको इस प्रकार अंधाधुंध कत्ल करनेसे कमसे-कम दो करोड़ बीस लाख रुपयेका नुकसान होता है। और अंत में, जिस देशमें पानीकी तरह दूध सर्वसुलभ होना चाहिए उस देशमें हमें विदेशसे आनेवाला सारहीन दूध पीना पड़ रहा है। विदेशसे आया हुआ दूध और घीके नामपर हमारे हाथ बेचा जानेवाला वनस्पति तेल हमें ताजे दूध-घीके अभाव में खाना पड़ता है, यह हमारे लिए कुछ कम शर्मिन्दगीकी बात नहीं है। बम्बई तथा अन्य शहरोंमें बहुत हदतक बेकारकी चीख-पुकार तो मच सकती है किन्तु जीवदया मण्डलोके अतिरिक्त अन्य किसीको ऐसे महत्त्वपूर्ण मामलेके बारेमें आवाज उठाने और प्रभावशाली आन्दोलन करनेकी बात नहीं सूझती।

जैसा कि उपर्युक्त पत्रमें सुझाया गया है, इस व्याधिको दूर करनेके उपाय सरल और सहज हैं। यदि शहरसे गाय-भैंसोंके बाड़े हटा दिये जायें और विशेषकर बम्बई में दूध वितरणका काम, किसी भी कीमतपर, नगरपालिका अपने हाथमें ले ले तो एक भी गाय या भैंस अकारण कसाईखाने नहीं भेजी जायेगी। यह कितने आश्चर्यकी बात है कि बम्बई में जो भैंसें सुखी हुई मान ली जाती हैं उन भैंसोंको बारडोलीके किसान हँसी, खुशी ले जाते हैं और उनसे चार पैसे पैदा कर लेनेकी आशा रखते हैं। जो बारडोलीमें सम्भव है वह बम्बई में असम्भव नहीं होना चाहिए।

[गुजराती से]

नवजीवन, ४-११-१९२८

२२. विचारकी कीमिया

प्रसिद्ध लेखक आचार्य जैक्सकी एक पुस्तक है जिसका शब्दार्थ 'विचारकी कीमिया' है। उक्त पुस्तकके आधारपर 'यंग इंडिया' के इसी सप्ताहके अंकमें प्यारेलालका एक लेख प्रकाशित हुआ है। गुजराती पाठकोंको ध्यान में रखकर उसीके आधारपर तैयार किया गया यह लेख यहाँ दिया जा रहा है।

'विचारकी कीमिया' का यह अर्थ हुआ कि विचार कीमियाका काम करता है। यह तो कोई नहीं कह सकता कि कोई कीमियागर कभी लोहेसे सोना बना सका है या नहीं, किन्तु विचार तो निरन्तर कीमियाका काम करता ही रहता है। एक विचार करनेसे आदमी भयसे पीला पड़ जाता है, तो उससे उलटा दूसरा विचार करनेसे उसके चेहरेपर लाली छा जाती है। 'मेरे पेटमें मरोड़ उठ रही है', 'मेरा तो अन्त समय आ गया है' आदि सोचूं तो तुरन्त ही मेरा चेहरा उतर जायेगा। और अगर यह सोचकर कि मरोड़में क्या रखा है, यह तो अभीके अभी ही मिट जायेगी, मैं उसकी परवाह न करूँ तो इसका असर दूसरा ही होगा। कोई अनजान आदमी मेरे घरपर आ धमकता है तो उसके विषयमें मेरे मनमें शंका होती है; मैं उसे चोर-डाकू मान बैठता हूँ और डर जाता हूँ। मेरा लड़का आकर कहता है, "ये तो हमारे कुटुम्बके पुराने स्नेही हैं। बचपनसे परदेशमें रहने के कारण आप इन्हें