अहिंसाका अर्थ है विश्वप्रेम, जीवमात्रके प्रति करुणा और उससे उत्पन्न होनेवाली वह शक्ति जो अपनी देह तकको होम कर देनेकी क्षमता रखती हो। ऐसा प्रेम प्रकट होनेतक बहुत-सी भूलें हों तो भी इस धर्मके विस्तारकी शोधको तिलांजलि नहीं दी जा सकती। शुद्ध मार्गको खोज में होनेवाली मूलें भी हमें उस मार्गकी खोजमें एक कदम आगे ले जाती हैं।
[गुजरातीसे]
नवजीवन, ४-११-१९२८
२३. सत्याग्रह आश्रम
इस आश्रम नियमावलीका[१] मसौदा कुछ ही दिन पहले 'नवजीवन में प्रकाशित किया गया था। उसके बारेमें बाहरके लोगोंकी राय माँगी गई थी। आश्रममें भी उसपर काफी चर्चा चली तथा उसमें महत्त्वपूर्ण फेरफार करनेके सुझाव प्राप्त हुए। कुछ-एक सुझावोंपर अमल भी प्रारम्भ किया गया। मगर उन्हें प्रकाशित करनेका अवसर मिलने के पहले ही अखबारोंमें भड़कानेवाली काल्पनिक खबरें छपने लगीं। इसलिए हाल में जिन परिवर्तनोंका प्रयोग चल रहा है, उन्हें पाठकोंके[२] सामने रखना मेरे लिए आवश्यक है।
सत्याग्रह आश्रमका नाम गुणवाचक रखे जानेके कारण आश्रम में हमेशा सत्यका ही अनुसरण करने, उसीके आधारपर चलनेका प्रयत्न किया जाता रहा है। हम उसमें हमेशा सफल ही हुए हों सो नहीं कहा जा सकता। ऐसा दावा भी नहीं किया जा सकता कि आश्रम में सभीने सदा सत्यकी ही आराधना की है। हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि यहाँ कुल मिलाकर सत्यका ही अनुसरण किया गया है। कठिन प्रसंगोंपर भी बहुतोंने, जिनमें छोटे-बड़े सब शामिल हैं, सत्यका पालन किया है।
सत्यका आग्रह रखते हुए आचरण करते-करते आश्रमवासियोंने अपनी एक त्रुटिको समझा। सत्याग्रह आश्रमके अनुरूप नियमोंका सूक्ष्म रूपसे सख्ती के साथ पालन करने में बहुतसी कठिनाइयोंका अनुभव हुआ। धीरे-धीरे समय बीतनेपर कतिपय नियमोंका जो सूक्ष्म अर्थ हमारी पकड़ में आया और हमने देखा कि उनका तदनुसार पालन करनेकी शक्ति हममें नहीं है, इसलिए हम इस निश्चयपर पहुँचे कि उन नियमोंको कायम तो रखा जाये किन्तु आश्रमका नाम बदल डालें। सत्याग्रह आश्रमके अनुरूप परिग्रहको इच्छा मनमें भी न हो, किसीकी ऐसी मानसिक स्थिति शायद ही देखनेको मिली। सत्याग्रह आश्रमके योग्य सत्यका पालन करनेमें स्वप्न में भी प्रमाद नहीं होना चाहिए ऐसा माननेपर भी अतिशयोक्ति के दोषोंमें से बचना मुश्किल जान पड़ा। ब्रह्मचर्य के पालन में मनोविकार भी न होने चाहिए, यह समझते हुए भी मन