सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/५९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२५
सत्याग्रह आश्रम

पर अपना काबू हम बहुत कम देख सके। सत्याग्रह आश्रमके योग्य अहिंसाका पालन करनेके लिए हममें क्रोध न होना चाहिए, एक दूसरेके प्रति ईर्ष्या न होनी चाहिए। यदि चोर आये तो उसे प्रेमपूर्वक भेंटनेकी शक्ति हममें होनी चाहिए और हममें इतना आत्मबल होना चाहिए कि सर्पादि भले ही हमें काटें, मगर हम उन्हें न मारें। इस अहिंसासे हमने अपनेको दूर पाया। इस विचारधाराके कारण हमने सोचा कि सत्याग्रह आश्रमको आदर्श रूपसे चला कर, उसकी सभी बाह्य प्रवृत्तियोंको दूसरे नामसे चलायें। सत्याग्रह आश्रमका बाह्य स्वरूप रहा है निरन्तर उद्यम और उद्योग; और यह दावा किया जा सकता है कि यहाँ उद्यम अथवा उद्योग भलीभाँति किया जाता रहा है। इसलिए उसे सत्याग्रह आश्रमके बदले उद्योग मन्दिर नाम दिया गया। यह निश्चित हुआ कि सत्याग्रह आश्रम अपने सारे काम उद्योग मन्दिरको सौंप दे और अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक, प्रार्थना करनेका जो छोटा-सा खुला मैदान है, उसे रख ले।

इसपर हाल में कोई एक महीनेसे अमल हो रहा है। मन्दिरका कार्यवाहक मण्डल जो फेरफार करना चाहे उसे उन्हें करनेका पूरा अधिकार है। मगर तो भी उसने खूब सोच-विचार कर आश्रमके ही नियमोंका पालन करनेका निश्चय किया है। केवल वे नियम अब उसके सामने आदर्शरूपमें रहेंगे और प्रत्येक सदस्य उन नियमोंके पालनका प्राणपणसे निरन्तर प्रयत्न करता रहेगा। खबर छपी है कि अबसे ऐसे स्त्री-पुरुष भी आश्रम में रह सकेंगे जो ब्रह्मचर्यका पालन करनेको तैयार नहीं हैं; वह बिलकुल निराधार है। प्रबन्धक समितिने इस विषयपर विशेष रूपसे विचार करके निश्चय किया है कि ब्रह्मचर्यके बिना उद्योग-मन्दिरको यज्ञके भावसे चलाया ही नहीं जा सकता। आश्रम में मनचाहे कार्यक्रमोंको स्थान नहीं दिया जा सकता; बल्कि वही कार्य हाथमें लिए गये हैं, जिनसे जनताके गरीब तबकेको लाभ पहुँच सकता है, जिनसे उनकी आर्थिक स्थितिमें सुधार और उन्नति हो सकती है। प्रबन्धक समितिने दृढ़तापूर्वक एकमत से यह निश्चय किया है कि ऐसी प्रवृत्तियाँ तभी चल सकती हैं जब कि उनके चलानेवाले स्त्री-पुरुष ब्रह्मचारी हों। और यह सही है।

आश्रम में कोई भी काम रुपयेके लाभको दृष्टिसे नहीं चलाया जा सकता। कोई विशेष कार्यक्रम जनताके बीच कैसे चल सकता है इसी दृष्टिसे उसका अभ्यास किया जाता है। अपनी वंशवृद्धि या भोग भोगने में लगे हुए स्त्री-पुरुष यह शिक्षा न तो स्वयं ग्रहण कर सकते हैं और न दूसरोंको दे सकते हैं।

इसलिए सारांश यह निकला कि सत्याग्रह आश्रमके जो नियम हैं और उन नियमोंके अनुसार आज जो लोग काम कर रहे हैं, वही उन कामोंको उद्योग-मन्दिरके नामसे चलायेंगे। नाम बदल देना नम्रता और सत्यकी खातिर आवश्यक था। कार्यकर्त्ताओंमें आत्मविश्वास उत्पन्न हो जानेपर वे फिरसे उसका नाम 'सत्याग्रह आश्रम' रख ले सकेंगे।

हाँ, एक उल्लेखनीय परिवर्तन और हुआ है, जिसे सत्याग्रह आश्रम में करना असम्भव जान पड़ता था। आश्रममें एक ही भोजनालय चलानेका प्रयत्न कोई तीन महीने से चल रहा है। आश्रमके नियमोंमें अस्वाद व्रत भी है। उसके अनुसार