रसोई में मसाले वगैरह त्याग दिये गये थे। यह त्याग कितने ही लोगोंको बहुत कठिन जान पड़ा किन्तु संयुक्त भोजनालय बंद करना भी उचित नहीं जाना पड़ा। इसलिए उसे बनाये रखकर, बिना मसालेका और मसालेदार, दोनों तरहका खाना बनाने की व्यवस्था की गई। जब कुटुम्ब अलग-अलग रसोई बनाते थे तो वे आश्रम में मसालोंका उपयोग करते थे। नई नियमावलीके अनुसार संयुक्त रसोईमें मसालोंको कोई स्थान नहीं था, किन्तु अब वे काममें लाये जाने लगे हैं।
[गुजराती से]
नवजीवन, ४-११-१९२८
२४. पत्र: जहाँगीर बी॰ पेटिटको
सत्याग्रहाश्रम, साबरमती
४ नवम्बर, १९२८
१३ वर्ष पूर्व आप मुझे अन्धोंके पालन-पोषण और शिक्षणसे सम्बन्धित संस्था तथा जे॰ जे॰ पारसी अस्पताल दिखाने ले गये थे। जूनागढ़से मेरे पास एक अर्ध-अनाथ युवक आया है। उसके पिताकी मृत्यु हो गई है; माँ जीवित है। उनके पास जीविकोपार्जनका कोई साधन नहीं है। किसी व्यक्तिने यह कहकर उन्हें मेरे पास भेजा है कि मैं सम्भवतः उनके लिए कोई ऐसी संस्था ढूंढ़ सकूँ जो इस युवकको अपने यहाँ आश्रय दे सके और कुछ शिक्षा दे सके। उसे गुजरातीके अलावा और कोई भाषा नहीं आती। क्या आप मुझे जल्दी से जल्दी सूचित कर सकेंगे कि आपकी संस्था इस युवकको आश्रय दे सकती है या नहीं।[१] सात वर्ष पूर्व उसे बड़े जोरकी चेचक निकली थी, जिसमें उसकी आँखें जाती रहीं।
विधवा माँ और उसका अन्धा बेटा इस समय यहाँ अहमदाबादमें टिके हुए हैं। मैं आशा करता हूँ कि यह नवयुवक आपकी संस्था-जैसी किसी लोकोपकारक संस्था द्वारा अपने जीवनकी आकांक्षा पूरी कर पायेगा।
हृदयसे आपका,
आरगेनाइजर ऑफ द इन्स्टीट्यूशन फॉर द सपोर्ट
एण्ड इन्स्ट्रक्शन ऑफ ब्लाइंड
पेटिट भवन, ३५९ हार्नबी रोड
फोर्ट, बम्बई।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १२९८४ ) की फोटो नकलसे ।
- ↑ ७ नवम्बर, १९२८ के पत्र में जहाँगीर बी॰ पेटिटने उत्तरमें यह लिखा कि वे बालकको तारदेव-स्थित विक्टोरिया मेमोरियल स्कूल फॉर द ब्लाइंडमें लेनेको तैयार हैं, बशर्ते कि स्कूल के नियमों के अधीन वह अस्पृश्य न हो।