सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 38.pdf/६१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

२५. पत्र: मीराबहनको

साबरमती
[५ नवम्बर, १९२८][]

चि॰ मीरा,

उम्मीद है, तुम्हें मेरा तार[] मिल गया होगा। तुम्हें अपने-आपको थकाना [नहीं][] चाहिए। भाग-दौड़ करनेकी कोई जरूरत नहीं है। और अपने स्वास्थ्यके लिए तुम्हें जिन चीजोंकी निश्चित तौरपर जरूरत है, उन्हें हर हालतमें लो। मेरी बीमारीके बारेमें कोई खबर पढ़कर चिन्तित मत होना। मुझे हलका-सा मलेरिया हो गया था। आज बिलकुल ठीक हूँ।

सस्नेह,

बापू

श्रीमती मीराबाई
खादी भण्डार
मुजफ्फरपुर, बिहार

अंग्रेजी जी॰ एन॰ ८२१२ एवं (सी॰ डब्ल्यू॰ ५२२२ ) से।

सौजन्य: मीराबहन

२६. पत्र: प्रताप एस॰ पण्डितको[]

सत्याग्रहाश्रम, साबरमती
५ नवम्बर, १९२८

प्रिय प्रताप,

मेरे अनुरोधका उत्तर देने में इतनी तत्परता दिखानेके लिए धन्यवाद। हाँ, सुरेन्द्रजी आश्रमके सबसे पुराने और विश्वस्त लोगोंमें से हैं। उन्होंने मुझे अपने पत्र में लिखा है कि आपका व्यवहार बड़ा सौजन्यपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने यह भी लिखा कि उस भेदको, जो कि स्पष्टतः उनके मनमें है, छिपाकर रखनेका बन्धन वे नहीं

  1. डाककी मुहरसे।
  2. देखिए "तार: मीरावहनको", ३-११-१९२८।
  3. स्पष्ट है कि मूलमें अनजाने ही यह भूल रह गई थी।
  4. १ नवम्बर, १९२८ (एस॰ एन॰ ११३९९) के अपने पत्र में प्रताप एस॰ पण्डितने लिखा था: "श्रीयुत सुरेन्द्र आपका परिचय पत्र साथ लाये हैं — मैं समझता हूँ कि वे काफी समयसे आपके आश्रममें हैं और इसलिए हम उनपर विश्वास कर सकते हैं कि वे हमारे प्रतिद्वन्द्रियोंको हमारे भेद नहीं देंगे।"