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४०. पत्र : ए० शंभुनाथनको
सत्याग्रहाश्रम, साबरमती
९ नवम्बर, १९२८
प्रिय मित्र,
आपका पत्र मिला । आपने 'यंग इंडिया' के पृष्ठोंमें आश्रमकी नियमावलीके[१]बारेमें सब-कुछ पढ़ ही लिया होगा ।
इतना तो कहूँगा ही कि आपको महिलाओंके बारेमें अपशब्द नहीं कहने चाहिए थे । आपको बिलकुल चुप रहना चाहिए था ।
जहाँतक 'गीता' का सम्बन्ध है, आपको तमिल अनुवाद प्राप्त करना चाहिए, जो आसानी से पढ़ा जा सकता है ।
आजकल मैं इतना व्यस्त हूँ कि अपना पत्र-व्यवहार मैं स्वयं लिख कर नहीं निबटा सकता ।
हृदयसे आपका,
ए० शंभुनाथन
मारफत श्रीयुत टी० रत्नसभापति मुदलियार
३२, आफिस वेंकटाचला मुदली स्ट्रीट
- अंग्रेजी (एस० एन० १२९९३) की फोटो- नकलसे ।
४१. पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको[२]
सत्याग्रहाश्रम, साबरमती
९ नवम्बर, १९२८
प्रिय मित्र,
आपके पत्रके लिए और शास्त्रीजीके उत्तराधिकारीकी नियुक्ति के सम्बन्धमें आपने मुझे जो विश्वास दिया है, उसके लिए धन्यवाद ।
- ↑ १. देखिए खण्ड ३६, पृष्ठ ४१९-३१ और "महात्मा होनेका नुकसान", ८-११-१९२८ भी ।
- ↑ २. मुहम्मद हबीबुल्लाके ५ नवम्बर, १९२८ के पत्रके उत्तर में। अपने पत्र में उन्होंने लिखा था : “सर के० वी० रेड्डी, जो मद्रासके पहले मन्त्रिमण्डल के सदस्य रह चुके है,... भारतमें शायद उतने प्रसिद्ध नहीं हैं जितने कि शास्त्री या जयकर हैं। लेकिन, मैं उन्हें कई वर्षोंसे जानता हूँ । उनकी स्थाति न हो पानेका कारण वास्तव में यह है कि वे अपेक्षाकृत कम उम्रके हैं और उनका काम अपने ही प्रान्ततक सोमित रहा है। लेकिन स्थानीय स्वशासनके क्षेत्रमें और मन्त्रीके रूपमें प्रशासनके बृहत्तर क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी लगन, ईमानदारी और देशभक्तिके बलपर विशिष्ट कार्य करके दिखाया है।" (एस० एन० ११९९८)