करो कि दूसरेकी सम्पत्तिको हानि न पहुँचे', यह एक धर्म-वचन ही है । पर मैं यह नहीं समझ सका कि वकालतका पेशा करते हुए मुवक्किलके पक्षमें इसका उपयोग कैसे सम्भव होता होगा। जिन मुकदमोंमें इस सिद्धान्तका उपयोग किया गया था, वे मैंने पढ़े थे। पर उनमें भी मुझे इसका उपयोग करनेकी कुंजी हाथ न लगी ।
इसके सिवा जो कानून पढ़े थे उनमें हिन्दुस्तानके कानूनका तो उल्लेख ही नहीं था । मैं वहाँ हिन्दू शास्त्र और इस्लामी कानूनके बारेमें कुछ भी नहीं जान पाया, न मैंने वहाँ अर्जी दावा तैयार करना सीखा। मैं बहुत चिन्तित हुआ । मैंने फीरोजशाह मेहताका नाम सुना था । सुना था कि वे अदालतों में सिंहकी तरह गर्जना करते हैं । भला उन्होंने यह कला विलायत में कहाँ सीखी होगी। उनकी जैसी होशियारी तो इस जीवन में मिल नहीं सकती । साधारण वकीलके नाते आजीविका कमानेकी शक्ति प्राप्त करनेके विषय में भी मेरा मन बहुत अधिक शंकित हो उठा ।
लंदन में कानूनका अध्ययन करते हुए भी मैं इन शंका-कुशंकाओंके भँवरमें पड़ा था। मैंने दो-एक मित्रोंके सामने अपनी कठिनाइयाँ रखीं। उन्होंने सुझाया कि मैं दादाभाई नौरोजीकी सलाह लूँ । यह तो मैं सूचित कर चुका हूँ कि मेरे पास दादाभाईके नाम दिया हुआ एक पत्र भी था । उस पत्रका उपयोग मैंने बहुत दिनोंके बाद किया। ऐसे महान् पुरुषसे मिलने जानेका मुझे क्या अधिकार है ? उनका कहीं भाषण होता तो मैं उसे सुनने जाता और एक कोने में बैठकर नेत्र और श्रवण तृप्त करके लौट आता । उन्होंने विद्यार्थियोंके सम्पर्क में आनेकी दृष्टिसे एक मण्डल भी स्थापित किया था। मैं उसमें हाजिरी देता रहता । विद्यार्थियोंके प्रति दादाभाईकी चिन्ता और दादाभाईके प्रति विद्यार्थियोंका आदर देखकर मुझे आनन्द होता था । आखिर एक दिन मैंने उन्हें अपने पासका सिफारिशी पत्र देनेका साहस जुटा लिया । मैं उनसे जाकर मिला। उन्होंने मुझसे कहा, तुम मुझसे मिलकर जब भी कोई सलाह लेना चाहो, जरूर मिलना । पर मैंने उन्हें कभी कोई कष्ट नहीं दिया । किसी जबरदस्त कठिनाईके उपस्थित होनेके अलावा उनका समय लेना मुझे पाप जान पड़ता। इसलिए उक्त मित्रकी सलाहके अनुसार दादाभाईके सामने अपनी कठिनाइयाँ रखनेकी मेरी हिम्मत नहीं पड़ी । कदाचित् उन्हीं अथवा किसी और मित्रने मुझे सुझाया कि मैं श्री फ्रेडरिक पिकटसे मिलूं। श्री पिंकट कंजरवेटिव (अनुदार दल) के थे, किन्तु हिन्दुस्तानियोंके प्रति उनके मनमें स्वच्छ और निःस्वार्थ प्रेम था । अनेक विद्यार्थी उनसे मार्गदर्शन लेते थे । इसलिए मैंने उन्हें पत्र लिखकर मिलनेका समय माँगा । उन्होंने समय दिया। मैं उनसे मिला। इस मुलाकातको मैं कभी नहीं भूल सका। वे मुझसे एक मित्रकी तरह मिले। मेरी निराशाको तो उन्होंने हँसकर ही टाल दिया । " क्या तुम यह मानते हो कि सबका फीरोजशाह मेहता बनना जरूरी है ? फीरोजशाह मेहता या बदरुद्दीन तैयबजी तो एक-दो ही होते हैं । इतना निश्चित समझ लो कि साधारण वकील बननेके लिए बहुत अधिक होशियारीकी जरूरत नहीं होती । साधारण प्रामाणिकता और अध्यवसायसे मनुष्य भली-भाँति वकालतका धन्धा कर सकता है। सभी मुकदमे बारीकियोंसे भरे हुए नहीं होते। अच्छा, यह बताओ, सामान्य ज्ञानमें तुमने क्या-क्या पढ़ लिया है ?