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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१०३

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

दूसरा भाग

१. रायचन्दभाई

पिछले प्रकरण में मैंने यह लिखा कि बम्बईके बन्दरगाहमें समुद्र विक्षुब्ध था । जून-जुलाई में हिन्द महासागरके लिए यह कोई अजीब बात नहीं कही जा सकती । अदनसे ही समुद्र ऐसा था । सब लोग बीमार पड़ गये थे; अकेला मैं मजे में था । तूफान देखनेके लिए डेक पर खड़ा रहता, भींग भी जाता । सुबहके नाश्तेके समय मुसाफिरोंमेंसे हम एक या दो ही मौजूद रहते । जईकी लपसी, रकाबीको गोदमें रख कर ही खाई जा सकती थी, नहीं तो हालत ऐसी थी कि लपसी गोद में ही आ गिरती ।

मुझे तो लगता है कि बाहरका यह तूफान मेरे अन्तरके तूफानका ही चित्र था और जिस तरह बाहरका तूफान मुझे अशान्त नहीं कर पाया, वही बात अन्दरके तूफानके लिए भी कही जा सकती है। जातिका प्रश्न सामने आने ही वाला था । पेशे सम्बन्धी चिन्ता के विषय में भी मैं लिख चुका हूँ । इनके सिवा सुधार- प्रिय होनेके कारण मैंने कई प्रकारके सुधारोंकी कल्पना कर रखी थी। उनके विषय में भी चिन्तित था । कुछ और चिन्ताएँ अप्रत्याशित ही उत्पन्न हो गई ।

मैं माँको देखनेके लिए अधीर हो रहा था । जब नाव गोदी में पहुँची, तो मैंने अपने बड़े भाई साहबको वहाँ मौजूद पाया । उन्होंने डा० मेहता और उनके बड़े भाईसे तबतक परिचय प्राप्त कर लिया था । डा० मेहताका आग्रह था कि मैं उन्हींके घर ठहरूँ, इसलिए वे मुझे वहाँ ले गये । इस प्रकार विलायतमें जो सम्बन्ध स्थापित हुआ था, वह देश में भी कायम रहा। इतना ही नहीं, उसने अधिक दृढ़ बनकर दोनों कुटुम्बोंको जोड़ दिया ।

मुझे खबर ही नहीं थी कि माताजीका स्वर्गवास हो चुका है। घर पहुँचने पर मुझे इसकी खबर दी गई और स्नान कराया गया। यों यह समाचार विलायत में दिया जा सकता था, किन्तु बड़े भाईने इस विचारसे कि आघात असह्य न हो जाये, बम्बई पहुँचने तक मुझे खबर न देनेका निश्चय कर रखा था । किन्तु मैं अपने दुःखकी चर्चा नहीं करूँगा । पिताकी मृत्युसे मुझे जो आघात पहुँचा था, माताकी मृत्युकी ख़बरसे मुझे जो आघात पहुँचा, वह उसकी तुलना में बहुत अधिक था। मेरे कितने ही मनोरथ मिट्टी में मिल गये । पर मुझे याद है कि माँकी मृत्युके इस समाचारको सुनकर मैं फूट-फूट कर नहीं रोया । मैं अपने आँसुओंको रोकनेके साथ-साथ अपने रोजमर्राका काम इस तरह शुरू कर पाया था मानो कुछ हुआ ही न हो ।

डा० मेहताने अपने स्थान पर जिन लोगोंसे मेरा परिचय कराया, उनमें से एकका उल्लेख किये बिना काम नहीं चल सकता। उनके भाई रेवाशंकर जगजीवन तो मेरे आजन्म मित्र बन ही गये, किन्तु मैं जिनकी चर्चा करना चाहता हूँ वे हैं कवि रायचन्द अथवा राजचन्द्र । वे डा० मेहताके बड़े भाईके जामाता और रेवाशंकर जगजीवन पेढ़ीके साझेदार तथा कर्त्ता-धर्ता थे । उस समय उनकी अवस्था २५ सालसे