अधिक नहीं थी, फिर भी अपनी पहली ही मुलाकात में मुझे ऐसा लगा कि वे चरित्र- वान और ज्ञानी पुरुष हैं । वे शतावधानी माने जाते थे । डा० मेहताने मुझे उनके शतावधानका नमूना देखने को कहा। मैंने अपने भाषा-ज्ञानका भण्डार खाली कर दिया और कविने मेरे कहे हुए शब्दोंको उसी क्रम में सुना दिया, जिस क्रममें वे कहे गये थे। उनकी इस शक्तिपर मुझे ईर्ष्या तो हुई, किन्तु मुग्ध मैं उसपर नहीं हुआ । मुग्ध करनेवाली वस्तुका परिचय तो बाद में हुआ। वह था उनका व्यापक शास्त्र ज्ञान, उनका शुद्ध चरित्र और आत्मदर्शनकी दिशामें उनका उत्कट उत्साह । मैंने बाद में जाना कि वे इस अन्तिम बातके लिए ही जीवन जी रहे थे :
हसतां रमतां प्रगट हरि देखूं रे,
मारुं जीव्युं सफल तव लेखूं रे;
मुक्तानन्दनो नाथ विहारी रे,
ओधा जीवनदोरी हमारी रे। [१]
मुक्तानन्दका यह वचन उनकी जीभपर तो था ही, वह उनके हृदय में भी अंकित था । वे हजारोंका व्यापार करते, हीरे-मोती परखते और व्यापारकी समस्याओंको सुलझाते, किन्तु ये सब बातें उनके जीवनका केन्द्र नहीं थीं। उनकी मुख्य बात, उनका पुरुषार्थ तो था आत्म-परिचय, हरिदर्शन । वे जिस गद्दीपर बैठते थे उसपर कोई दूसरी चीज हो चाहे न हो, पर कोई न कोई धर्म-पुस्तक और डायरी अवश्य रहती । व्यापारकी बात समाप्त होते ही वे धर्म-पुस्तक अथवा डायरी खोल लेते । उनके लेखोंका जो संग्रह प्रकाशित हुआ है उसका अधिकांश इस डायरीसे ही लिया गया है । जो मनुष्य लाखोंके लेन-देनकी बात समाप्त करते ही तुरन्त आत्मज्ञानकी गूढ़ बातें लिखने बैठ जाये, उसकी जाति व्यापारीकी नहीं, शुद्ध ज्ञानीकी है। उनके विषय में मुझे ऐसा अनुभव एक बार नहीं, अनेक बार हुआ था । मैंने उन्हें कभी असन्तुलित नहीं देखा । मुझसे उनका कोई स्वार्थ नहीं था । मैं उनके बहुत निकट सम्पर्क में रहा हूँ। मैं उस समय एक निष्कांचन बैरिस्टर था, पर मैं जब कभी उनकी दुकान पर पहुँचता, वे मेरे साथ ब्रह्म-चर्चाके सिवाय दूसरी कोई बात ही न करते । यद्यपि उस समय तक मैं अपनी दिशा निश्चित नहीं कर पाया था; यह भी नहीं कह सकता कि मुझे साधारणतया धर्म-चर्चा में रस आने लगा था; फिर भी मैं रायचन्दभाईकी बातें रुचिपूर्वक सुनता था । उसके बाद मैं अनेक धर्माचार्योंके सम्पर्क में आया हूँ | मैंने सभी धर्मोके आचार्योंसे मिलनेका प्रयत्न किया है, किन्तु जो छाप मुझपर रायचन्द्रभाईने डाली, वैसी कोई दूसरा नहीं डाल सका। उनके बहुतेरे वचन सीधे हृदय में उतर जाते थे। मैं उनकी बुद्धिका सम्मान करता था और उनकी प्रामाणिकताके लिए भी मेरे मनमें वैसा ही आदर था । इसलिए मुझे विश्वास था कि वे मुझे जान-बूझकर गलत रास्ता नहीं दिखायेंगे और वही कहेंगे, जो उनके अन्तरकी
१. हँसते-खेलते सभी कामोंमें जब मुझे हरिके दर्शन हों तभी मैं अपने जीवनको सफल मानूँगा । मुक्तानन्द कहते हैं, "भगवान् मेरे नाथ हैं और वही मेरी जीवन-टोरी भी हैं। "