सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१०५

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
७३
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

बात होगी। इस कारण मैं अपने आध्यात्मिक संकटके समय उनका आश्रय लिया करता था।

रायचन्दभाईके प्रति इतना आदर रखते हुए भी मैं उन्हें अपने धर्मगुरुके रूपमें हृदय में स्थान नहीं दे सका। मेरी वह खोज तो आज भी चल रही है।

गुरुके पदको हिन्दू धर्ममें जो महत्व प्राप्त है उसमें में विश्वास रखता हूँ । 'गुरु बिन होय न ज्ञान', इस वचनमें बहुत कुछ सत्य है । अक्षर ज्ञान देनेवाले शिक्षक अपूर्ण हों, तो काम चल सकता है, किन्तु आत्मदर्शन करानेवाला शिक्षक अपूर्ण हो, तो काम नहीं चल सकता । गुरुपद सम्पूर्ण ज्ञानीको ही दिया जा सकता है । गुरुकी खोज में ही सफलता छुपी हुई है; क्योंकि शिष्यको अपनी योग्यताके अनुसार ही गुरु मिलता है। इसका यह अर्थ हुआ कि योग्यता प्राप्तिके लिए प्रत्येक साधकको सम्पूर्ण प्रयत्न करनेका अधिकार है और ऐसे प्रयत्नका फल ईश्वरके हाथ में है ।

कहनेका आशय यह है कि यद्यपि मैं रायचन्दभाईको अपने हृदयका स्वामी नहीं बना सका, तो भी हम आगे देखेंगे कि मुझे समय-समय पर किस प्रकार उनका सहारा मिलता रहा। यहाँ तो इतना ही कहना काफी होगा कि मेरे जीवनपर गहरा प्रभाव डालनेवाले आधुनिक मनुष्य तीन हैं : रायचन्द भाईने अपने सजीव सम्पर्कसे, टॉल्स्टॉयने 'बैकुण्ठ तेरे हृदय में है ' ( किंग्डम आफ गाड इज विदिन यू ) नामक पुस्तकसे और रस्किनने 'सर्वोदय' (अन्टु दिस लास्ट ) नामक पुस्तक से मुझे चकित कर दिया । किन्तु इस विषय में हम यथास्थान चर्चा करेंगे ।

२. संसार - प्रवेश

बड़े भाईने मुझसे बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँध रखी थीं । उनको पैसेका, कीर्तिका और पदका बहुत लोभ था । उनका दिल बादशाहों-जैसा था । उदारता उन्हें फिजूल- खर्चीकी हद तक ले जाती थी । इस कारण और अपने भोले प्रभावके कारण उन्हें मित्र बनाते देर न लगती थी। अपनी इस मित्र मण्डलीकी मदद से वे मेरे लिए मुकदमे जुटाना चाहते थे । उन्होंने यह भी मान लिया था कि मैं खूब कमाऊँगा, इसलिए उन्होंने घर-खर्च भी बढ़ा रखा था । मेरे लिए वकालतका क्षेत्र तैयार करनेमें भी उन्होंने कोई कसर नहीं उठा रखी थी।

जातिका झगड़ा अभी तक समाप्त नहीं हुआ था । जातिमें दो तड़ें पड़ गई थीं-- एक पक्षने मुझे जातिमें ले लिया और दूसरा न लेनेपर डटा रहा । जातिमें लेनेवाले पक्षको सन्तुष्ट करनेके लिए भाई मुझे राजकोट ले जानेसे पहले नासिक ले गये । वहाँ मुझे गंगा स्नान कराया गया और राजकोट पहुँचनेपर जाति-भोज दिया गया। मुझे इस सबमें कोई दिलचस्पी नहीं थी । बड़े भाईके मनमें मेरे लिए अगाध प्रेम था और मैं मानता हूँ कि मेरे मनमें उनके प्रति वैसी ही भक्ति थी; इसलिए उनकी इच्छाको आदेश मानकर मैं यन्त्रकी भाँति बिना समझे उनकी इच्छाका अनु- सरण करता रहा। इससे जातिका प्रश्न हल हो गया ।