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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१०७

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

काममें आती थीं, वे चीनी मिट्टीके बर्तन, चाय आदि अब सबके लिए काममें आने लगे । ऐसे वातावरणमें मैं अपने सुधार लेकर वहाँ पहुँचा । 'ओटमील पॉरिज' (जईकी लपसी) दाखिल की गई और चाय-काफीके बदले कोकोको जगह मिली। किन्तु यह परिवर्तन नाम मात्रका ही रहा । चाय-काफीके साथ कोको और जुड़ गई, कहिए । बूट-मोजे तो घरमें घुस ही चुके थे, मैंने कोट-पतलूनको भी दाखिल कर दिया ।

इस तरह खर्च बढ़ा, नवीनताएँ बढ़ीं। आँगनमें सफेद हाथी बँध गया ! पर यह सब खर्च जुटाया कैसे जाये ? यदि तुरन्त राजकोट में धन्धा शुरू कर देता हूँ, तो हँसी होती है। मेरे पास ज्ञान तो इतना भी नहीं था कि राजकोट में वकालत पास करनेवाले किसी वकीलके मुकाबले में भी खड़ा हो सकूँ । इसपर फीस लेनी थी उनसे दस गुना ! कौन मूर्ख मुवक्किल मुझे काम देता ! फिर यह प्रश्न भी था कि यदि कोई ऐसा मूर्ख मिल भी जाये तो क्या मुझे अपने अज्ञानके साथ-साथ धृष्टता और विश्वासघातको भी जोड़कर अपने आपको संसारका अधिक कर्जदार बना लेना चाहिए ।

मित्रोंने सलाह दी कि मैं कुछ समयके लिए बम्बई जाकर हाई-कोर्टकी वकालत का अनुभव प्राप्त करूँ और हिन्दुस्तानके कानूनका अध्ययन करनेके साथ-साथ कोई मुकदमे मिल सकें, तो उन्हें प्राप्त करनेकी कोशिश भी करूँ। मैं बम्बईके लिए रवाना हुआ ।

वहाँ घर लिया । रसोइया रखा । रसोइया मेरे जैसा ही था । वह ब्राह्मण था । मैंने उसे कभी नौकरकी तरह रखा ही नहीं । यह ब्राह्मण नहाता तो था, पर घोता नहीं था । उसकी धोती मेली, जनेऊ मैला । शास्त्रके अभ्याससे कोई सरोकार नहीं । लेकिन और अच्छा रसोइया कहाँसे लाता ?

क्यों रविशंकर ( उसका नाम रविशंकर था), तुम रसोई बनाना तो नहीं जानते, पर सन्ध्या आदि भी जानते हो या नहीं ? "

क्या कहूँ भाईसाहब, हल मेरी सन्ध्या और कुदाली खटकर्म है। मैं तो ऐसा ही ब्राह्मण हूँ । आप जैसे किसीने निभा लिया, तो ठीक नहीं तो खेती तो कहीं गई ही नहीं है ।"

मैं समझ गया कि मुझे रविशंकरका शिक्षक बनना होगा । मेरे पास काफी समय था । आधी रसोई रविशंकर बनाता और आधी मैं। मैंने यहाँ विलायतके अन्नाहार-सम्बन्धी भोजनके प्रयोग शुरू किये। एक स्टोव खरीदा। मैं स्वयं तो पंक्ति-भेद मानता ही नहीं था, रविशंकरको भी उसका आग्रह नहीं था, इसलिए हमारी ठीक पटरी जम गई। शर्त या मुसीबत, जो कहो, यही थी कि रविशंकरने मैलसे सम्बन्ध विच्छेद करने और रसोईको साफ रखनेकी मानो शपथ खा रखी थी।

लेकिन चार-पाँच महीनेसे अधिक इस तरह अकेले बम्बई में रहना सम्भव नहीं बना। क्योंकि खर्च बढ़ता जाता था और आमदनी तो कुछ भी नहीं थी ।

इस तरह मैंने संसारमें प्रवेश किया। बैरिस्टरी मुझे अखरने लगी। इसमें आडम्बर अधिक और ज्ञान कम । उत्तरदायित्वका विचार मुझे दबोचे डाल रहा था ।