सकते थे। कारकुन गलती कर दें, तो उनसे जवाब तलब किया जा सकता था किन्तु अगर गलती मुझसे हो जाये तो क्या हो ? इस तरह काम या तो मुकदमेका था या मुहर्रिरका । तीसरा कोई काम ही नहीं था । ऐसी हालत में यदि मुझे मुकदमेका काम न सौंपा जाता, तो मेरे रखनेका कोई लाभ ही नहीं था ।
अब्दुल्ला सेठका अक्षर ज्ञान बहुत मामूली था, किन्तु अनुभव-ज्ञान बहुत था । उनकी बुद्धि तीव्र थी और इस बातका उन्हें स्वयं भी भान था । अभ्याससे उन्होंने बातचीत करने लायक अंग्रेजीका ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वे अपना सारा काम इस अंग्रेजीसे चला लेते थे । वे बैंक मैनेजरोंसे बातचीत करते थे, यूरोपीय व्यापारियोंके साथ सौदे कर लेते थे और वकीलोंको अपने मामले समझा सकते थे । हिन्दुस्तानियोंमें उनका बड़ा मान था । उनकी फर्म वहाँकी तत्कालीन हिन्दुस्तानी फर्मोंमें सबसे बड़ी थी; बड़ी फर्मोंमें से एक तो थी ही । किन्तु अब्दुल्ला सेठका स्वभाव शंकालु था ।
उन्हें इस्लामका अभिमान था । वे तत्वज्ञानकी चर्चाके शौकीन थे । वे अरबी नहीं जानते थे, फिर भी कह सकते हैं कि उन्हें कुरान शरीफ और मोटे तौरपर इस्लाम के धार्मिक साहित्यकी अच्छी जानकारी थी । दृष्टान्त उनकी जुबान पर रहते । उनके साथ रहने से मुझे भी इस्लामका काफी व्यावहारिक ज्ञान हो गया। हम एक- दूसरेको समझने लगे; इसके बाद तो वे मुझसे खूब धर्म-चर्चा करते रहते ।
दूसरे या तीसरे दिन वे मुझे डर्बनकी अदालत दिखाने ले गये । वहाँ कुछ जान-पहचान कराई। अदालत में मुझे अपने वकीलके साथ बैठाया । मजिस्ट्रेट मुझे बार-बार देखता रहा । उसने मुझे पगड़ी उतारनेके लिए कहा। मैंने उतारनेसे इन्कार किया और अदालत छोड़कर चला गया ।
मेरे भाग्य में तो यहाँ भी लड़ाई बदी थी ।
सेठ अब्दुल्लाने मुझे समझाया कि यहाँ पगड़ी उतारनेके लिए क्यों कहा जाता है; यदि व्यक्ति मुसलमानी ढंगकी पोशाक पहने हो तो वह मुसलमानी ढंगकी पगड़ी पहने रह सकता है । दूसरे हिन्दुस्तानियोंको अदालत में प्रवेश करते ही अपनी पगड़ी उतार लेनी चाहिए ।
इस सूक्ष्म भेदको समझानेके लिए मुझे कुछ तफसील में उतरना पड़ेगा। इन दो या तीन दिनोंमें ही मैंने देख लिया था कि हिन्दुस्तानी आफ्रिकामें अपने छोटे-छोटे समुदाय बनाकर बैठ गये थे । एक भाग मुसलमान व्यापारियोंका था । वे अपनेको अरब कहलवाते थे। दूसरा समुदाय हिन्दू या पारसी कारकुनों, मुनीमों या गुमाश्तोंका था । हिन्दू कारकुन अधर में लटके हुए थे। इनमेंसे कोई अरबोंमें मिल जाता था । पारसी अपनेको 'पर्शियन' कहते थे । व्यापारके अलावा भी इन तीनों वर्गोंका परस्पर थोड़ा- बहुत सम्बन्ध अवश्य था । एक चौथा वर्ग था तमिल, तेलुगू और उत्तर हिन्दुस्तानके गिरमिटियों तथा गिरमिट मुक्त हिन्दुस्तानियोंका । यह वर्गं बड़ा था। गिरमिटका अर्थ है वह इकरार जिसके अनुसार उन दिनों गरीब हिन्दुस्तानी पाँच साल तक मजदूरी करनेके लिए नेटाल जाते थे. एग्रीमेंट । गिरमिट 'एग्रीमेंट' का ही अपभ्रंश है और उसीसे यह गिरमिटिया शब्द बना है । इस वर्गसे दूसरोंका व्यवहार केवल कामकी दृष्टिसे ही रहता था । अंग्रेज इन गिरमिटवालोंको 'कुली' कहते थे और चूंकि इनकी