सवेरे ईसा सेठके लोग मुझे सिकरम तक पहुँचाने गये। मुझे ठीक जगह दी गई और बिना किसी परेशानीके मैं उस रात जोहानिसबर्ग पहुँच गया।
स्टैंडर्टन एक छोटा-सा गाँव है और जोहानिसबर्ग एक विशाल नगर । अब्दुल्ला सेठने तार तो यहाँ भी दे ही दिया था। मुझे मुहम्मद कासिम कमरुद्दीनकी दूकानका पता-ठिकाना भी दे दिया था। उनका आदमी सिकरम ठहरनेकी जगहपर पहुँचा, पर वह मुझे नहीं पहचान सका और न मैं उसे । मैंने होटलमें जानेका विचार किया । दो-चार होटलोंके नाम जान लिये थे । एक गाड़ी की गाड़ीवालेसे कहा कि ग्रैंड नेशनल होटल में ले चलो। वहाँ मैनेजरके पास पहुँचा और जगह माँगी। मैनेजरने क्षण-भर मुझे निहारा। फिर शिष्टाचारयुक्त भाषा में कहा, “मुझे खेद है, सभी कमरे भरे हुए हैं।" उसने मुझे विदा कर दिया। इसलिए मैने गाड़ीवालेसे मुहम्मद कासिम कमरुद्दीनकी दूकान पर चलनेको कहा । वहाँ अब्दुल गनी सेठ मेरी राह देख रहे थे । उन्होंने मेरा स्वागत किया। मैंने होटलकी बात उन्हें सुनाई । वे खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले : “ वे हमें होटलमें कैसे उतरने देंगे ।
मैंने पूछा, क्यों नहीं ? "
" सो तो आप यहाँ कुछ दिन रहने के बाद जान जायगे । इस देशमें तो हम ही रह सकते हैं; क्योंकि हमें पैसे कमाने हैं । इसीलिए तरह-तरहके अपमान सहन करते हैं और पड़े रहते हैं।" इसके बाद उन्होंने ट्रान्सवालमें हिन्दुस्तानियोंपर गुजरने- वाले कष्टोंकी कहानी कह सुनाई ।
इन अब्दुल गनी सेठका परिचय फिर आगे चलकर आयेगा ।
उन्होंने कहा, यह देश आपके जैसे लोगोंके लिए नहीं है। देखिए कल आपको प्रिटोरिया जाना है। वहाँ आपको तीसरे दरजे में ही जगह मिलेगी। ट्रान्सवालमें नेटालसे अधिक कष्ट है । हमारे यहाँके लोगोंको ट्रान्सवालमें पहले या दूसरे दरजेका टिकट दिया ही नहीं जाता । "
मैंने कहा, " आपने इसके लिए पूरी कोशिश नहीं की होगी । " अब्दुल करीम बोले, "हमने लिखा-पढ़ी तो की है, पर हमारे यहाँके अधिकतर लोग भी पहले दूसरे दरजे में बैठना कहाँ चाहते हैं । '
मैंने रेलवेके नियम मँगाकर उन्हें पढ़ा। उनमें इस बातकी गुंजाइश थी । ट्रान्सवालके मूल कानून बारीकीके साथ नहीं बनाये जाते थे। रेलवेके नियमोंका तो पूछना ही क्या है ।
मैंने सेठसे कहा, "मैं तो फर्स्ट क्लासमें ही जाऊँगा और यदि वह सम्भव नहीं हुआ, तो प्रिटोरिया यहाँसे ३७ ही मील तो है, मैं घोड़ा गाड़ी करके वहाँ चला जाऊँगा । "
अब्दुल गनी सेठने उसमें लगनेवाले खर्च और समयकी तरफ मेरा ध्यान खींचा। पर वे मेरे विचारसे सहमत ही हुए । मैंने स्टेशन मास्टरको पत्र लिखा । पत्रमें मैंने अपने बैरिस्टर होनेका उल्लेख किया और यह भी कहा कि मैं हमेशा पहले दरजेमें ही सफर करता हूँ । अपने तुरन्त प्रिटोरिया पहुँचनेकी जरूरतकी तरफ भी उनका ध्यान खींचा और उन्हें लिखा कि उत्तरकी प्रतीक्षा करने योग्य समय मेरे पास नहीं