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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१२७

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा
१०. प्रिटोरियामें पहला दिन

मैंने सोचा था कि दादा अब्दुल्लाके वकीलकी ओरसे कोई आदमी मुझे प्रिटोरिया स्टेशनपर मिलेगा । यह तो मैं जानता था कि कोई हिन्दुस्तानी मुझे लेने नहीं आया होगा । मैं यह भी कह चुका था कि मैं किसी हिन्दुस्तानीके घर नहीं ठहरूंगा । स्टेशन पर वकीलने कोई भी आदमी नहीं भेजा था । बादमें मुझे पता चला कि जिस दिन मैं पहुँचा, वह रविवार था । इसलिए वे जिसको भेजते, उसे कुछ न कुछ असुविधा होती । स्टेशन पर किसीको न पाकर मैं परेशान हुआ । सोचने लगा, कहाँ जाऊँ । कोई होटल मुझे अपने यहाँ जगह नहीं देगा, ऐसा डर था ।

सन् १८९३ के प्रिटोरिया स्टेशन और १९१४ के प्रिटोरिया स्टेशनमें बड़ा फर्क था । धीमी-धीमी रोशनीवाली बत्तियाँ जल रही थीं। यात्री भी अधिक नहीं थे । मैंने सब यात्रियोंको चले जाने दिया और सोचा कि जब टिकट कलेक्टरको थोड़ी फुरसत हो जायेगी तब उसे टिकट दूंगा और यदि उसने मुझे किसी छोटे-से होटल या ठहरने लायक किसी मकानका पता बता दिया तो वहाँ चला जाऊँगा या फिर रात स्टेशन पर ही काट लूंगा । यो अपमानके डरसे इतना पूछने की भी हिम्मत नहीं पड़ती थी ।

जब यात्रियोंके चले जाने पर स्टेशन सूना हो गया, तब मैंने टिकट देकर टिकट कलेक्टर से पूछताछ की। उसने उत्तर सभ्यताके साथ दिये, पर मैंने देखा कि वह मेरी मदद करनेमें असमर्थ है। उसकी बगलमें एक अमेरिकन हब्शी सज्जन खड़े थे । उन्होंने मुझसे बातचीत शुरू की :

" देख रहा हूँ कि आप बिलकुल अजनबी हैं और यहाँ आपका कोई परिचित नहीं है । अगर आप मेरे साथ चलें तो मैं आपको एक छोटे-से होटलमें ले चलूंगा । उसका मालिक अमेरिकन है और उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। मेरा ख्याल है कि वह आपको टिका लेगा । "

मुझे थोड़ा शक तो हुआ, पर मैंने इनका उपकार माना और साथ जाना स्वीकार किया। वे मुझे जॉन्स्टन के 'फैमिली होटल' में ले गये। पहले उन्होंने श्री जॉन्स्टनको एक ओर ले जाकर थोड़ी बात की। श्री जॉन्स्टनने मुझे एक रातके लिए ठहराना कबूल किया और वह भी इस शर्त पर कि भोजन मेरे कमरेमें पहुँचाया जायेगा ।

श्री जॉन्स्टनने कहा, "मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मेरे मनमें तो काले-गोरेका कोई भेद नहीं है, पर मेरे सभी ग्राहक गोरे हैं। यदि मैं आपको भोजनगृहमें भोजन कराऊँ, तो वे बुरा मानेंगे और शायद चले ही जायेंगे । "

मैंने जवाब दिया, “आप मुझे एक रातके लिए टिकने दे रहे हैं, यह भी आपका उपकार ही है । इस देशकी स्थिति से म थोड़ा परिचित हो गया हूँ । मैं आपकी कठिनाई समझ सकता हूँ । आप खुशीसे खाना कमरेमें भेज दीजिए। कल तक मैं दूसरा प्रबन्ध कर लेनेकी आशा रखता हूँ ।

मुझे कमरा दे दिया गया। मैंने उसमें प्रवेश किया और एकान्त मिलनेपर भोजन आनेकी राह देखता हुआ विचारोंमें डूब गया। इस होटलमें अधिक यात्री