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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१२८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

नहीं थे। थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि भोजन लेकर वेटर नहीं आ रहा है, खुद श्री जॉन्स्टन आ रहे हैं। उन्होंने कहा, मैंने आपको कमरेमें खाना देनेकी बात बताई थी। पर मुझे ऐसा करनेमें शर्म आई और मैंने अपने ग्राहकोंसे बातचीत करके उनकी राय जाननी चाही । आप भोजन-गृहमें उनके साथ बैठकर भोजन करें तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। इसके अलावा आप चाहे जितने दिन यहाँ रहें, उनकी ओरसे कोई आपत्ति नहीं होगी । इसलिए यदि आप चाहें तो भोजन-गृहमें चलिए और जब- तक जी चाहे यहाँ रहिए ।"

मैंने उनका उपकार माना और भोजन गृहमें गया। वहाँ मैंने निश्चिन्त होकर भोजन किया ।

दूसरे दिन सबेरे मैं वकीलके घर गया । उनका नाम था, ए० डब्ल्यू० बेकर । उनसे मिला । अब्दुल्ला सेठने मुझे उनके बारेमें कुछ बता दिया था । इसलिए हमारी पहली मुलाकातसे मुझे कोई आश्चर्य न हुआ । वे मुझसे प्रेमपूर्वक मिले, और मेरे बारेमें कुछ बातें पूछीं, जो मैंने उन्हें बतला दीं। उन्होंने कहा, "बैरिस्टरके नाते तो आपका यहाँ कोई उपयोग हो ही न सकेगा । इस मुकदमे के लिए हमने अच्छे-से-अच्छे बैरिस्टर कर रखे हैं। मुकदमा लम्बा है और गुत्थियोंसे भरा हुआ है। इसलिए आपसे मैं आवश्यक तथ्य आदि प्राप्त करनेका ही काम ले सकूंगा । पर इतना फायदा अवश्य होगा कि अपने मुवक्किलके साथ पत्र व्यवहार करने में मुझे अब आसानी हो जायेगी, और तथ्यादि की जो जानकारी मुझे प्राप्त करनी होगी, वह मैं आपके द्वारा मँगवा सकूंगा । आपके लिए अभी तक मैंने कोई मकान तो तलाश नहीं किया है । सोचा था कि आपको देखनेके बाद खोज लूंगा । यहाँ रंगभेद बहुत है, इसलिए घर मिलना आसान नहीं है । पर मैं एक बहनको जानता हूँ । वह गरीब है, भटियारेकी स्त्री है । मेरा खयाल है कि वह आपको टिका लेगी । उसे भी कुछ मदद हो जायेगी। चलिए, हम उसके यहाँ चलें ।"

उसके बाद वे मुझे वहाँ ले गये । श्री बेकरने उस बहनको एक ओर ले जाकर उससे कुछ बातें कीं और उसने मुझे ठहराना स्वीकार कर लिया । निश्चय हुआ कि हफ्तेके तैंतीस शिलिंग दिये जायेंगे ।

श्री बेकर वकील होने के साथ-साथ कट्टर पादरी भी थे। वे अभी जीवित हैं । और अब केवल पादरीका ही काम करते हैं। वकालतका धन्धा उन्होंने छोड़ दिया है। रुपये-पैसे से सुखी हैं। मेरा उनका अबतक पत्र-व्यवहार होता है । पत्रोंका विषय एक ही रहता है । वे अपने पत्रों में अलग-अलग ढंगसे ईसाई धर्मकी उत्तमताकी चर्चा करते हैं और इस बातका प्रतिपादन करते हैं कि ईसाको ईश्वरका एकमात्र पुत्र और तारणहार समझे बिना परम शान्ति नहीं मिलनेकी ।

श्री बेकरने पहली ही मुलाकात में धर्म-सम्बन्धी मेरे विचारोंको पूछ लिया था । मैंने उन्हें बताया, "मैं जन्मसे हिन्दू हूँ । मुझे इस धर्मका भी बहुत ज्ञान नहीं है । दूसरे धर्मोका ज्ञान भी कम ही है । मैं यह सब नहीं जानता कि मैं क्या हूँ, क्या मानता हूँ और मुझे क्या मानना चाहिए। मैं अपने धर्मका गम्भीरता से अध्ययन करना चाहता हूँ । मेरा इरादा दूसरे धर्मोका यथाशक्ति अध्ययन करनेका भी है। "