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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१२९

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

यह सब सुनकर श्री बेकर खुश हुए। उन्होंने मुझसे कहा, "मैं साउथ आफ्रिका जनरल मिशनका एक डायरेक्टर भी हूँ। मैंने स्वयं अपने खर्चसे एक गिरजाघर बनवाया है। मैं समय-समयपर वहाँ धर्म-सम्बन्धी व्याख्यान देता रहता हूँ। मैं रंग- भेद नहीं मानता। कुछ अन्य लोग भी मेरे साथ काम करते हैं । हम प्रतिदिन एक बजे कुछ मिनटोंके लिए मिलते हैं और आत्माकी शान्ति तथा प्रकाश (ज्ञानके उदय) के लिए प्रार्थना करते हैं । आप उसमें शामिल होंगे, तो मुझे खुशी होगी। मैं वहाँ अपने सहयोगियोंसे भी आपकी पहचान करा दूंगा । वे सब आपसे मिलकर प्रसन्न होंगे और मुझे विश्वास है कि आपको भी उनका साथ अच्छा लगेगा। मैं आपको कुछ धार्मिक पुस्तकें भी पढ़नेको दूंगा । पर सच्ची पुस्तक तो बाइबल ही है । मेरी सलाह है कि आप उसे अवश्य पढ़िए ।"

मैंने श्री बेकरको धन्यवाद दिया और यथासम्भव रोज एक बजे प्रार्थनाके लिए उनके मण्डलमें पहुँचना स्वीकार किया ।

" तो कल एक बजे यहीं आ जाइए। हम साथ-साथ प्रार्थना-मन्दिर चलेंगे । हम जुदा हुए। अभी मुझे अधिक सोचनेका अवकाश नहीं था । मैं श्री जॉन्स्टनके पास गया और उनका बिल चुकाकर नई जगह जा पहुँचा । वहाँ भोजन किया। घर मालकिन बड़ी भली स्त्री थी । उसने मेरे लिए अन्नाहार तैयार कर दिया था । मुझे इस कुटुम्बसे घुलने-मिलने में देर नहीं लगी ।

भोजनसे निश्चिन्त होकर मैं उन मित्रसे मिलने गया जिनके नाम दादा अब्दुल्ला ने पत्र दिया था। उनसे जान-पहचान हुई । हिन्दुस्तानियोंकी दुर्दशा के विषय में उनसे और भी विशेष बातें जाननेको मिलीं । उन्होंने मुझे अपने घर रहनेका आग्रह किया। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और जो व्यवस्था हो चुकी थी उसके विषय में बताया । उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा कि जब जिस चीजकी आवश्यकता हो, मैं उनसे माँग लिया करूँ ।

शाम हुई और व्यालू करने के बाद मैं अपने कमरेमें जाकर विचारोंमें तल्लीन हो गया । मैंने देखा कि फिलहाल तो मेरे लिए कोई काम नहीं है । अब्दुल्ला सेठको इसकी सूचना भी भेज दी। मैं सोचने लगा, श्री बेकरकी मित्रताका क्या अर्थ हो सकता है । उनके धर्म भाइयोंसे मुझे क्या मिल सकेगा ? मुझे ईसाईधर्मका अध्ययन किस हद तक करना चाहिए। हिन्दू धर्मका साहित्य कहाँसे प्राप्त हो सकता है ? अपने धर्मको समझे बिना मैं ईसाईधर्मके स्वरूपको कैसे समझ सकता हूँ। मैं एक इसी निर्णयपर पहुँच सका कि मुझे जो कुछ भी पढ़नेको मिले, उसे मैं निष्पक्ष भावसे पढूँ और श्री बेकरके साथियोंको वही उत्तर दूं जो जिस समय भगवान मुझे सुझा दे । जबतक । मैं अपने धर्मको पूरी तरह नहीं समझ लेता, तबतक मुझे अन्य धर्मोंको स्वीकार करनेका विचार नहीं करना चाहिए।

इस तरह सोचते हुए मेरी नींद लग गई ।

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