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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१३

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नौ

शोभा देता है; पर व्यवस्थापकके विरुद्ध झगड़ा करना तो अपने विरुद्ध झगड़ने के समान है। क्योंकि हम सबकी रचना एक ही चक्रपर की गई है, हम एक ही ब्रह्माके बनाये हुए हैं । व्यवस्था में अनन्त शक्तियाँ निहित हैं । व्यवस्थापकका अनादर या तिर- स्कार करनेसे उन शक्तियोंका अनादर होता है और इससे व्यवस्थापकको और संसार को हानि पहुँचती है। "(पृष्ठ २१०) जब हम दुष्कर्म और दुष्कर्मीको अलग अलग देख पाते हैं और दुष्कर्मीके प्रति करुणाकी भावना मन में रखते हैं, तभी हमारे लिए यह सम्भव होता है कि हम दुष्कर्मों को उसके अधिक सही रूपमें देख सकें, किसी मानसिक उलझावमें न पड़ें और बिना पशोपेशके दुष्कर्मों को तीव्रतर मुकाबला कर सकें। इस तरह हम देखते हैं कि अहिंसासे, संघर्ष में पड़े हुए सभी पक्षीकों नैतिक रूपसे तो लाभ होता ही है, इस उपायसे व्यावहारिक सफलता प्राप्त करनेकी भी अधिक सम्भावना बन जाती है ।

सत्याग्रहमें संघर्ष व्यक्तियों अथवा पक्षोंके बीच में नहीं माना जाता; सत्य और असत्य, सही और गलतके बीच माना जाता है । समस्त परिस्थितिगत सत्यको हस्त- गत कर लिया जाता है और तब उसका विनियोग असत्यको पराजित करनेके लिए करते हैं । फलतः न कोई विजित होता है न कोई विजेता । किसीको ऐसा नहीं लगता कि हमने खोया, हम अपनानित हुए। जिस सीमा तक सत्यकी विजय होती है, उस सीमा तक सम्बन्धित पक्षों से प्रत्येक पक्ष उल्लसित और विजयका साधन बननेमें अपनेको भागीदार मानता है । निरासक्त होनेके कारण युक्त पुरुष दूसरोंकी अपेक्षा इस सत्यका कहीं अधिक साक्षात्कार करता है कि : " तथ्य ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है । तथ्य अर्थात् सच बात । सच बातको पकड़े रहने से कानून अपने-आप हमारी मददके लिए आ जाते हैं।” (पृष्ठ १०६) केवल कानून ही नहीं, जनमत और यहाँ तक कि निहित स्वार्थीको भी तथ्योंकी अनुशासित पंक्तिके सामने सिर झुकाना पड़ता है । चम्पारन सत्याग्रह में यहीं सिद्ध हुआ । उस आन्दोलनमें न कोई शोर-शराबा था, न गर्जन-तर्जन । केवल एकके बाद एक जाँचे-परखे तथ्योंके विवरण-भर प्रस्तुत कर दिये गये थे ।

खर्चका नियमित रूपसे हिसाब रखना भो सत्यका लेखा-जोखा रखने के समान है और इससे व्यक्तिको अपनी कमजोरियाँ जोतनेमें मदद मिलती है । " प्राप्त होनेवाले थोड़े-बहुत पैसेका हिसाब भी यदि समझदारीके साथ रखा जाये, तो हरएक नवयुवकको उसका वही लाभ समझमें आयेगा, जिसका अनुभव आगे चलकर मैंने और जनताने किया ।" (पृष्ठ ४५) किसी भी संस्थामें सावधानीके साथ हिसाबकिताब रखना एक अनिवार्य वस्तु है । उसके बिना गति नहीं है । " बारीकी से हिसाब रखे बिना सत्यको असत्य से अलिप्त रखना सम्भव नहीं होता ।" (पृष्ठ १२० )

प्राचीन भारतकी यह परम्परा रही है कि जोर सत्यके निर्वैयक्तिक रूप पर दिया जाये; आविष्कृत सत्यकी ही महिमा गायी जाये, इस बातको अधिक महत्व