पुत्र है । उसे वरदान प्राप्त है कि जो तुझे मानेगा उसका पाप धुल जायेगा । यह ईश्वरकी अगाध उदारता है । हमने ईशुकी इस मुक्ति योजनाको स्वीकार किया है, इसलिए हमारे पाप हमें नहीं पकड़ते । पाप तो होते ही रहते हैं । इस जगतमें पाप अवश्यम्भावी है । इसीसे ईशुने सारे संसारके पापोंका एक ही बारमें प्रायश्चित्त कर डाला । जो उनके महाबलिदानमें विश्वास ला सकते हैं, वे शान्ति यों ही प्राप्त कर सकते हैं । कहाँ आपकी अशान्ति और कहाँ हमारी शान्ति ? "
उनका यह कथन मेरे गले बिलकुल ही न उतरा । मैने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया :
" यदि सर्वमान्य ईसाई धर्म यही है, तो वह मेरे किसी कामका नहीं है । मैं पापके परिणामसे मुक्त नहीं होना चाहता, मैं तो पाप-वृत्तिसे, पाप-कर्मसे ही छुटकारा चाहता हूँ । जबतक मुझे वह छुटकारा नहीं मिलता, तबतक मुझे अपनी यह अशान्ति प्रिय रहेगी । "
प्लीमथ ब्रदरने उत्तर दिया, "मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपका प्रयत्न व्यर्थ है । मेरी बातपर फिर विचार कीजियेगा । "
और इन भाईने जैसा कहा था, व्यवहार द्वारा वैसा करके भी दिखा दिया जान-बूझकर अनीति कर दिखाई ।
पर सभी ईसाइयोंकी ऐसी मान्यता नहीं होती, सो तो मैं इन सज्जनोंसे परिचय करनेके पूर्व भी जान सका था । कोट्स स्वयं पापसे डरकर चलनेवाले व्यक्ति थे । उनका हृदय निर्मल था । वे मानते थे कि हृदय-शुद्धि एक सम्भावना है। उक्त बहनें भी ऐसा ही मानती थीं। मुझे जो पुस्तकें हाथ लगी थीं, उनमेंसे कई भक्तिपूर्ण थीं । अतएव इस परिचयके कारण कोट्सको जो परेशानी हुई थी, उसे मैंने शान्त किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि एक 'प्लीमथ ब्रदर'की अनुचित मान्यताके आधारपर मैं ईसाई धर्मके विरुद्ध कोई गलत राय नहीं बना सकता ।
मेरी कठिनाइयाँ तो बाइबल और उसके रूढ़ार्थको लेकर थीं ।
१२. हिन्दुस्तानियोंसे परिचय
ईसाइयोंसे सम्बन्धके विषयमें और कुछ लिखनेसे पहले उसी समय जो दूसरे अनुभव हुए, उनका उल्लेख कर देना आवश्यक है।
नेटालमें जो स्थान दादा अब्दुल्लाका था, वही स्थान प्रिटोरिया में सेठ तैयब हाजी खान मुहम्मदका था । उनके बिना एक भी सार्वजनिक काम आगे नहीं बढ़ सकता था । मैंने पहले ही हफ्ते में उनसे परिचय प्राप्त कर लिया। मैंने उन्हें बताया कि मैं प्रिटोरिया निवासी हर हिन्दुस्तानीके सम्पर्क में आना चाहता हूँ । मैंने हिन्दुस्तानियोंकी स्थितिका अध्ययन करनेकी इच्छा प्रकट की और इन सब कामोंमें उनकी मदद चाही । उन्होंने खुशीसे मदद देना स्वीकार किया ।
सबसे पहला काम तो मैंने यह किया कि सारे हिन्दुस्तानियोंकी एक सभा करके उनके सामने समूची परिस्थितिका चित्र खड़ा करनेकी कोशिश की। यह सभा सेठ