मैंने धीरज नहीं छोड़ा। उनमें से किसीको अंग्रेजीका गहरा अध्ययन तो करना ही नहीं था, फिर भी ऐसा कहा जा सकता है कि करीब आठ महीनोंमें दो लोगोंने अच्छी प्रगति कर ली थी। दोनोंने हिसाब-किताब रखना और साधारण पत्र-व्यवहार करना सीख लिया । हज्जाम तो अपने ग्राहकोंके साथ बातचीत कर लेने लायक अंग्रेजी ही सीखना चाहता था । अन्य दो व्यक्तियोंने इस तरह पढ़कर ठीक जीविका कमानेकी शक्ति भी प्राप्त कर ली थी।
सभाका जो असर हुआ, उससे मैं सन्तुष्ट हुआ । निश्चय किया गया कि हर हफ्ते अथवा हर महीने इस तरह की सभा की जाये। न्यूनाधिक नियमित रूपसे सभा होने लगी और उसमें विचारोंका आदान-प्रदान शुरू हो गया। नतीजा यह हुआ कि प्रिटोरिया में शायद ही कोई ऐसा हिन्दुस्तानी बच गया जिसे मैं पहचानने न लगा होऊँ अथवा जिसकी स्थितिसे मैं परिचित न हो गया होऊँ । भारतीयोंकी स्थितिको इस तरह जान लेने के परिणामस्वरूप प्रिटोरिया में रहनेवाले ब्रिटिश एजेंटसे परिचय की मुझे इच्छा हुई । मैंने श्री जैकोव्स डीवेटसे मुलाकात की। वे हिन्दुस्तानियोंके साथ सहानुभूति रखते थे । उनका प्रभाव कम था। फिर भी उन्होंने कहा कि वे यथासम्भव मदद करेंगे और मैं आवश्यकतानुसार उनसे मिलता रह सकता हूँ ।
मैंने रेलवे अधिकारियोंसे पत्र-व्यवहार शुरू किया और यह स्पष्ट किया कि उनके अपने ही कायदोंके अनुसार भारतीयोंको ऊँचे दरजेमें यात्रा करनेसे नहीं रोका जा सकता । परिणामस्वरूप पत्र द्वारा उत्तर मिला कि ठीक पोशाक पहने हुए हिन्दुस्तानियोंको ऊँचे दरजेके टिकट दिये जायेंगे। इससे पूरी सुविधा नहीं मिली, क्योंकि ठीक पोशाकका निर्णय तो स्टेशन मास्टरके द्वारा ही किया जाना था न ?
ब्रिटिश एजेंटने हिन्दुस्तानियोंके बारेमें पत्र-व्यवहार सम्बन्धी सभी कागज मुझे पढ़नेके लिए दिये। सेठ तैयबजीने भी मुझे कुछ कागजात दिये। मुझे उनसे पता चला कि आरेंज फ्री स्टेटसे किस निर्दयता के साथ भारतीयोंको निकाल बाहर किया गया था।
सारांश यह कि मैं प्रिटोरिया में हिन्दुस्तानियोंकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थितिका गहरा अध्ययन कर सका। तब मुझे इस बातकी कोई कल्पना ही नहीं थी कि मुझे आगे चलकर इस अध्ययनका बड़ा लाभ मिलेगा। क्योंकि मैंने तो यह सोचा था कि मुझे तो एक साल पूरा होनेपर अथवा यदि मुकदमा पहले समाप्त हो गया तो उससे भी पहले स्वदेश लौट जाना था । किन्तु ईश्वरने तो कुछ और ही सोचा था ।