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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१३६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

यद्यपि इसका उपयोग कभी नहीं करना पड़ा, फिर भी इसे केवल एक संयोग ही समझना चाहिए।

डॉ० काउजेने मुझे अपने घर आनेका निमन्त्रण दिया। मैं कह सकता हूँ कि हम दोनोंके बीच मित्रता हो गई। मैं कभी-कभी उनके यहाँ जाने लगा । उन्हींकी मारफत मेरी पहचान उनके भाईके साथ हुई जो अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध थे । वे जोहानिसबर्ग में पब्लिक प्रासीक्यूटरकी तरह नियुक्त हुए थे। उनपर बोअर युद्धके समय किसी अंग्रेज अधिकारीकी हत्या करानेके षड्यन्त्रके लिए मुकदमा भी चला और उन्हें सात सालका कारावास दिया गया था। बेंचरोंने उनकी सनद भी छीन ली थी । लड़ाई समाप्त होनेपर डॉ० काउजे जेलसे छूटे। उन्हें सम्मानपूर्वक ट्रान्सवालकी अदा- लतमें प्रवेश दिया गया और वे फिर अपना काम करने लगे ।

बाद में ये सम्बन्ध मेरे लिए सार्वजनिक कार्योंमें उपयोगी सिद्ध हुए और इनके कारण मेरे कई सार्वजनिक कार्य आसानीसे हो सके ।

पटरी पर चलनेका प्रयत्न मेरे लिए कुछ गम्भीर सिद्ध हुआ । मैं हमेशा प्रेसिडेंट स्ट्रीटसे होकर एक खुले मैदानमें घूमने जाया करता था । प्रेसिडेंट क्रूगरका घर इस मोहल्ले में था । यह घर सभी तरहके आडम्बरोंसे हीन था। इसके आसपास कोई अहाता भी नहीं था । पासके दूसरे घरोंमें और इसमें कोई फर्क नहीं मालूम होता था । इसकी तुलना में प्रिटोरिया में कई लखपतियोंके घर बहुत बड़े शानदार और अहातेवाले थे । प्रेसिडेंट अपनी सादगीके लिए प्रसिद्ध थे । घरके सामने पहरा देनेवाले सन्तरीको देखकर ही यह पता चलता था कि घर किसी अधिकारीका है । प्रायः हमेशा ही मैं इस सिपाहीके बिलकुल करीबसे गुजरता था, पर उसने मुझे कभी नहीं टोका था ।

सिपाही कभी-कभी बदल जाया करते थे। एक बार एक सिपाहीने चेतावनी दिए बिना, पटरी परसे उतर जानेके लिए कहे बिना मुझे धक्का मारा, लात मारी और नीचे उतार दिया। मैं बड़े सोच में पड़ गया । लात मारनेका कारण पूछू इससे पहले ही श्री कोट्सने जो उसी समय घोड़े परसे सवार होकर उधरसे गुजर रहे थे, मुझे पुकारा और कहा :

"गांधी, मैंने सब-कुछ देखा है । अगर आप मुकदमा चलाना चाहेंगे तो मैं गवाही दूंगा । आपपर इस तरहका हमला होते देखकर मुझे बहुत दुःख हुआ है ।"

मैंने कहा, "इसमें खेदकी कोई बात नहीं है। सिपाही बेचारा क्या जाने । उसके लेखे तो काले-काले सब एक-से ही हैं। वह हरिशयोंको पैदल पटरीसे इसी तरह उतारता आया होगा । इसलिए उसने मुझे भी धक्का मारा। मैंने तो नियम ही बना लिया है कि मेरे अपने ऊपर जो कुछ बीतेगी मैं उसके लिए कभी अदालत में नहीं जाऊँगा । इस बातको लेकर मुझे अदालत में नहीं जाना है ।"

"यह तो आपने अपने स्वभावके अनुरूप ही कहा । पर आप इसपर फिरसे विचार करें। ऐसे आदमीको थोड़ा-बहुत सबक तो सिखाना ही चाहिए। इतना कहकर उन्होंने उस सिपाहीसे बात की और उसे भला-बुरा कहा । सारी बात तो मेरी समझ में नहीं आई। सिपाही डच था और उसके साथ वे डच भाषामें बोल रहे थे । सिपाहीने मुझसे माफी मांगी। मैं तो उसे पहले ही माफ कर चुका था ।