थी कि इस सम्मेलन में होनेवाली जागृति, वहाँ आनेवाले लोगोंके धार्मिक उत्साह और उनकी शुद्धताका मेरे हृदयपर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ेगा कि मैं ईसाई बने बिना नहीं रह सकूंगा ।
किन्तु इसके लिए श्री बेकरका अन्तिम आधार था - प्रार्थनाकी शक्ति | प्रार्थनामें उन्हें अटूट श्रद्धा थी । उनका विश्वास था कि अन्तःकरणसे की गई प्रार्थनाको ईश्वर अवश्य सुनता है । प्रार्थनासे ही मुलर (एक प्रसिद्ध श्रद्धालु ईसाई ) जैसे व्यक्ति अपना संसार चलाते हैं । इसके दृष्टान्त भी वे मुझे सुनाते रहते थे । प्रार्थनाकी महिमा के बारेमें मैंने सब-कुछ तटस्थ भावसे सुना। मैंने उनसे कहा कि यदि मेरे भीतर ईसाई बननेका अन्तर्नाद गूँजा तो उसे स्वीकार करनेम कोई भी वस्तु मेरे आड़े नहीं आ सकेगी। अन्तर्नादिके वशमें होना तो मैं कई वर्ष पहले सीख चुका था । अन्तर्नादका अनुसरण करने में मुझे आनन्द आता था । उसके विरुद्ध जाना मेरे लिए कठिन और दुःखद था ।
हम विलिंग्टन गये। मुझ 'साँवले साथी' को साथ रखना श्री बेकरके लिए भारी पड़ा। उन्हें कई बार मेरे कारण असुविधा झेलनी पड़ती थी । हमें रास्ते में रुकना था। क्योंकि श्री बेकरकी मण्डली रविवारको सफर नहीं करती थी और बीच में रविवार पड़नेवाला था । रास्ते में और स्टेशन पर मुझे होटलमें लेनेसे इन्कार किया गया और जब झिकझिकके बाद प्रवेश मिला, तो होटलके मालिकने मुझे भोजन-गृहमें भोजन करानेसे इन्कार कर दिया । किन्तु श्री बेकर इस तरह झुकनेवाले नहीं थे । वे होटलमें ठहरनेवालेके हक पर डट गये। लेकिन मैं उनकी कठिनाइयोंको समझ गया । वेलिंग्टन में भी मैं उनके साथ ठहरा था । वहाँ भी उन्हें छोटी-छोटी दिक्कतोंका सामना करना पड़ता था । वे सद्भावपूर्वक उन्हें छुपाना चाहते थे, लेकिन वे मेरी नजरोंमें आ जाती थीं ।
सम्मेलनमें श्रद्धालु ईसाई एकत्रित हुए । उनकी श्रद्धा देखकर मुझे प्रसन्नता हुई । मैं श्री मरेसे मिला । मैंने देखा कि मेरे लिए अनेक लोग प्रार्थना कर रहे हैं। कई भजन मुझे बहुत मीठे मालूम हुए ।
सम्मेलन तीन दिनों तक चला। मैं सम्मेलन में आनेवालोंकी धार्मिकताको समझ सका, उसकी सराहना कर सका। पर मुझे अपनी मान्यतामें-- अपने धर्ममें परिवर्तन करनेका कारण नहीं मिला। मुझे यह प्रतीति नहीं हुई कि मैं ईसाई बनकर भी स्वर्ग अथवा मोक्ष पा सकता हूँ। जब मैंने यह बात अपने भले ईसाई मित्रोंसे कही, तो उन्हें चोट पहुँची । किन्तु मैं लाचार था ।
मेरी कठिनाइयाँ गहरी थीं। यह बात मेरे गले भी नहीं उतरती थी, कि “एक ईसामसीह ही ईश्वरके पुत्र हैं, जो उन्हें मानता है वह तर जाता है ।" यदि ईश्वरके पुत्र हैं तो हम सब उसके पुत्र हैं । यदि ईसा ईश्वर तुल्य है, ईश्वर ही है, तो मनुष्य- मात्र ईश्वरके समान है; मनुष्य मात्र ईश्वर बन सकता है । ईसाकी मृत्युसे और उनके रक्त से संसारके पाप धुलते हैं, इसे अक्षरशः सत्य माननेके लिए बुद्धि तैयार नहीं होती थी । रूपककी तरह इसमें सत्य भले ही हो। इसके अतिरिक्त ईसाइयोंका विश्वास है कि आत्मा मनुष्यके ही है, दूसरे जीवोंके नहीं। और वे देहके नाशके