ईसाई धर्मका खण्डन था । उन्होंने मेरे नाम 'न्यू इन्टरप्रिटेशन ऑफ द बाइबिल ' ( बाइबिलकी नयी व्याख्या) नामक पुस्तक भी भेजी। मुझे ये पुस्तकें पसन्द आई । इनसे हिन्दू मतकी पुष्टि हुई। टॉल्स्टॉयकी पुस्तक ' किंग्डम ऑफ गाड इज विदिन यू' (वैकुण्ठ तेरे हृदय में है) ने मुझे अभिभूत कर लिया । उसकी मुझपर बड़ी गहरी छाप पड़ी । इस पुस्तककी स्वतन्त्र विचार- शैली, इसकी प्रौढ़ नीति और इसमें निरूपित सत्यके सम्मुख श्री कोट्स द्वारा दी गई सारी पुस्तकें मुझे रूखी लगीं ।
इस प्रकार मेरा अध्ययन मुझे उस दिशा में ले गया, जिस दिशा में जाना मेरे ईसाई मित्रोंको अभीष्ट नहीं था। एडवर्ड मेटलैंडके साथ मेरा पत्र-व्यवहार काफी लम्बे अरसे तक चला। कवि ( रायचन्दभाई ) के साथ तो अन्त तक बना रहा। उन्होंने कई पुस्तकें भेजीं। उन्हें भी मैं पढ़ गया । पंचीकरण', 'मणिरत्नमाला', योगवाशिष्ठ का मुमुक्षु प्रकरण, हरिभद्र सूरीका 'षड्दर्शन समुच्चय,' इत्यादि पुस्तकें उनमें थीं ।
इस प्रकार मैंने ऐसा मार्ग पकड़ लिया था जिसकी ईसाई मित्रोंने कल्पना नहीं की थी। फिर भी मैं उनके समागमसे मुझमें जागृत हुई धर्म-जिज्ञासा के कारण हमेशा के लिए उनका ऋणी बन गया । ये मधुर और पवित्र सम्बन्ध घटे नहीं, भविष्य में बढ़ते ही चले गये ।
१६. को जाने कल की ?
"खबर नहीं इस जगमें पलकी
समझ मन ! को जाने कलकी ? "
मुकदमा समाप्त हो गया । इसलिए अब मेरे प्रिटोरिया में रहनेका कोई प्रयोजन नहीं बचा। मैं डर्बन गया । वहाँ पहुँचकर वापस हिन्दुस्तान जानेकी तैयारी की। यह सम्भव नहीं था कि अब्दुल्ला सेठ मेरा मान-सम्मान किये बिना मुझे जाने देते । उन्होंने मेरे निमित्त से सिडनहममें एक सामूहिक भोजका आयोजन किया। पूरा दिन वहीं बिताया जाना था ।
मेरे पास कुछ अखबार पड़े हुए थे । मैं उन्हें देख रहा था। मैंने किसी अखबारके एक कोने में एक छोटा-सा संवाद देखा । शीर्षक था 'इंडियन फ्रेंचाइज यानी हिन्दुस्तानी मताधिकार । संवादका आशय यह था कि हिन्दुस्तानियोंको नेटालकी धारासभा के लिए सदस्य चुननेका जो अधिकार है वह छीन लिया जाये । धारासमामें इससे सम्बन्ध रखनेवाले कानूनपर बहस चल रही थी । मैंने इस कानूनके बारेमें नहीं सुना था। भोज में सम्मिलित सदस्योंमें से किसीको भी हिन्दुस्तानियोंके मताधिकार छीननके इस विधेयककी कोई खबर नहीं थी ।
मैंने अब्दुल्ला सेठसे पूछा । उन्होंने कहा, "हम इन बातोंको क्या जानें । व्यापार पर कोई बादल घिरता है, तो हम उसकी खबर रखते हैं । देखिए न, ऑरेंज फ्री स्टेटसे हमारी जड़ ही उखड़ गई । उसके लिए हमने प्रयत्न किया, पर हम तो अपंग