बिलका दूसरा वाचन हो चुका था या होनेवाला था । उस समय धारासभामें किये गये भाषणोंमें यह कहा गया था कि इतने कठोर कानूनका भी हिन्दुस्तानियोंकी ओरसे कोई विरोध नहीं हो रहा है, यह हिन्दुस्तानी समाजकी लापरवाहीका और मताधिकारका उपभोग करनेकी उनकी अयोग्यताका प्रमाण है ।
मैंने सभाको वस्तुस्थिति समझाई। पहला काम तो यह सोचा गया कि धारा- सभा के अध्यक्षको ऐसा तार भेजा जाये कि वे बिलपर आगे विचार करना मुलतवी कर दें । इसी आशयका तार प्रधानमन्त्री सर जॉन राबिन्सनको भी भेजा, और दूसरा दादा अब्दुल्लाके मित्रके नाते श्री एस्कम्बको भेजा गया। इस तारके जवाबमें अध्यक्षका तार मिला कि बिलकी चर्चा दो दिन तक मुलतवी रहेगी। सब खुश हुए।
प्रार्थना-पत्र तैयार किया गया। उसकी तीन प्रतियाँ भेजनी थीं। प्रेसके लिए भी प्रतियाँ तैयार करनी थीं। प्रार्थनापत्र पर जितनी मिल सकें उतनी सहियाँ लेनी थीं । यह सारा काम एक रातमें पूरा करना था । शिक्षित स्वयंसेवक और दूसरे लोग लगभग सारी रात जागे। उनमें अच्छे अक्षर लिखनेवाले श्री आर्थर नामके एक वृद्ध सज्जन थे। उन्होंने सुन्दर अक्षरोंमें प्रार्थना-पत्रकी प्रति तैयार की। दूसरोंने उसकी दूसरी प्रतियाँ तैयार कीं। एक बोलता जाता और पाँच लिखते जाते थे । यो एक- साथ पाँच प्रतियाँ लिखी गईं। व्यापारी स्वयंसेवक अपनी-अपनी गाड़ियाँ लेकर अथवा अपने खर्चसे गाड़ियाँ किराये पर लेकर सहियाँ लेनेके लिए निकल पड़े। प्रार्थनापत्र गया । अखबारोंमें छपा। उसपर अनुकूल टीकाएँ हुईं। धारासभा पर भी असर हुआ । उसकी चर्चा भी खूब हुई । प्रार्थना-पत्र में दी गई दलीलोंका खण्डन करते हुए उत्तर दिये गये । पर वे देनेवालोंको भी लचर जान पड़े। बिल तो फिर भी पास हो गया ।
सब जानते थे कि यही नतीजा निकलेगा, पर कौम में नवजीवनका संचार हुआ । सबकी समझमें यह आ गया कि हम एक कौम हैं, केवल व्यापार-सम्बन्धी अधिकारोंके लिए ही नहीं, बल्कि कौमके अधिकारोंके लिए भी लड़ना हम सबका धर्म है । उन दिनों लॉर्ड रिपन उपनिवेश-मन्त्री थे । उन्हें एक बहुत बड़ी अर्जी देनेका निश्चय किया गया। इस अर्जीपर यथासम्भव अधिक से अधिक लोगोंकी सहियाँ लेनी थीं। यह काम एक दिनमें तो हो ही नहीं सकता था । स्वयंसेवक नियुक्त हुए और सबने काम निबटानेका जिम्मा लिया ।
अर्जी लिखने में मैंने बहुत मेहनत की। जो साहित्य मुझे मिला, सो सब मैं पढ़ गया। हिन्दुस्तानमें हम एक प्रकारके मताधिकारका उपभोग करते हैं, इस सिद्धान्तिक दलीलको और ऐसे हिन्दुस्तानियोंकी आबादी जिन्हें मताधिकार मिल सकता है, कम है, इस व्यावहारिक दलीलको मैंने केन्द्र-बिन्दु बनाया ।
अर्जी पर दस हजार सहियाँ हुईं। एक पखवाड़ेमें अर्जी भेजने लायक सहियाँ प्राप्त हो गई। इतने समयमें नेटालमें दस हजार सहियाँ प्राप्त की गई, इसे पाठक छोटी-मोटी बात न समझें । सहियाँ समूचे नेटालसे प्राप्त करनी थीं। लोग ऐसे कामसे
१. देखिए खण्ड १, द्वितीय संस्करण पृष्ठ १३५-३९ ।
२. देखिए खण्ड १, द्वितीय संस्करण पृष्ठ २०८-२१
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