" पर हम आपको पहचानने लगे हैं। आप कौन अपने लिए पैसे माँगते हैं ? आपके रहनेका खर्च तो हमें देना चाहिए न ? "
यह बात तो आपका स्नेह और तात्कालिक उत्साह कहलवा रहा है। यही उत्साह और यही स्नेह सदा बना रहेगा, यह हम कैसे मान लें ? मौका आनेपर मुझे तो कभी-कभी आपको कड़वी बातें भी कहनी पड़ेंगी। उस दशामें भी मैं आपके स्नेहकी रक्षा कर सकूंगा या नहीं, सो तो देव जाने । पर असल बात यह है कि सार्वजनिक सेवाके लिए मुझे पैसे लेने ही नहीं चाहिए। आप सब वकालत सम्बन्धी अपना काम मुझे देनेके लिए वचनबद्ध हो जायें, तो उतना मेरे लिए बस है । शायद यह मी आपके लिए भारी पड़ेगा । मैं कोई गोरा बैरिस्टर नहीं हूँ । कोर्ट मुझे न्याय देगी या नहीं, मैं क्या जानूं ? मैं तो यह भी नहीं जानता कि मुझसे वकालत कैसी बनेगी । इसलिए मुझे पहलेसे वकालतका मेहनताना देना जोखिम उठाना है। इतने पर भी अगर आप मुझे वकालतका मेहनताना देंगे, तो वह मेरी सार्वजनिक सेवाके कारण ही माना जायेगा न ? "
इस चर्चाका परिणाम यह निकला कि कोई बीस व्यापारियोंने मेरे लिए एक वर्षका वर्षाशन बाँध दिया। इसके उपरान्त, दादा अब्दुल्ला विदाईके समय मुझे जो भेंट देनेवाले थे उसके बदले उन्होंने मेरे लिए आवश्यक फर्नीचर खरीद किया । और मैं नेटालमें बस गया ।
१८. रंग-भेद
न्यायालयका चिह्न तराजू है। एक निष्पक्ष, अन्धी परन्तु चतुर बुढ़िया उसे थामे हुए है। विधाताने उसे अन्धी बनाया है, जिससे वह मुंह देखकर तिलक न करे, बल्कि जो गुणमें योग्य हो उसीको टीका लगाये। इसके विपरीत, नेटालके न्यायालयसे वहाँकी वकील-समा मुँह देखकर तिलक करवाने के लिए कटिबद्ध थी । परन्तु अदालतने इस अवसर पर अपने चिह्नकी प्रतिष्ठा रख ली ।
मुझे वकालतकी सनद लेनी थी । मेरे पास बम्बईके हाईकोर्टका प्रमाणपत्र था । विलायतका प्रमाणपत्र बम्बईके हाईकोर्टके कार्यालय में था । प्रवेशके प्रार्थनापत्र के साथ सदाचरणके दो प्रमाणपत्रोंकी आवश्यकता मानी जाती थी । मैंने सोचा कि ये प्रमाण- पत्र गोरोंके होंगे तो ठीक रहेगा । इसलिए अब्दुल्ला सेठके द्वारा मेरे सम्पर्क में आये हुए दो प्रसिद्ध गोरे व्यापारियोंके प्रमाणपत्र मैंने प्राप्त कर लिये थे । प्रार्थना-पत्र किसी वकील द्वारा भेजा जाना चाहिए था, और साधारण नियम यह था कि ऐसा प्रार्थनापत्र अटर्नी जनरल बिना पारिश्रमिकके प्रस्तुत करे। श्री एस्कम्ब अटर्नी जनरल थे । हम यह तो जानते हैं कि वे अब्दुल्ला सेठके वकील थे। मैं उनसे मिला और उन्होंने खुशीसे मेरा प्रार्थनापत्र प्रस्तुत करना स्वीकार किया ।
इतने में अचानक वकील-सभाकी ओरसे मुझे नोटिस मिला। नोटिस में न्यायालय में मेरे प्रवेशका विरोध किया गया था । उसमें एक कारण यह दिया गया था कि