ग्यारह
और दुःखी निवासियोंके प्रेम में अपनी पूर्णताको प्राप्त हुआ । इसी तरह 'नवजीवन' के पृष्ठोंसे स्पष्ट होता है कि गांधीजी नैसर्गिक सौन्दर्यके प्रति समादरपूर्वक संवेदनशील थे । किन्तु आत्मकथामें इसका यदि कोई इंगित मिलता भी है तो नगण्य सा ।
इस तरह कह सकते हैं कि यह रचना गांधीजीकी तस्वीरको पूरी तरह सन्तोषदायक रूपमें प्रस्तुत नहीं करती । वह् सम-सामयिक इतिहासकी समीक्षा भी प्रस्तुत नहीं करती । किन्तु ये ऐसी मर्यादाएँ हैं, जिन्हें गांधीजीने पुस्तक लिखते समय सामने रखा था । इनके बावजूद गांधीजीके जीवनकी भीतरी झाँकी जाननेको उत्सुक विद्यार्थीको दृष्टिमें उसका महत्व किसी प्रकार कम नहीं होता। गांधीजी इसे लिखते हुए अपने भीतर झाँकते चलते हैं और प्रत्येक घटनाको जाँचते-परखते हैं; अपने नैतिक विकासके विविध सोपानोंका विश्लेषण करते हैं और जहाँसे जो सबक मिलता है, उसे उचित रूपमें स्पष्ट करते हैं । आत्मकथाका लेखन, पिछले वर्षोंमें उन्होंने जो कुछ किया था उसका स्मरण, उसके पीछे रही हुई प्रेरणाओंका और उसके आन्तरिक परिणामोंका समीक्षात्मक विश्लेषण - यह सब अपने-आपमें सत्यका ही एक प्रयोग था; (पृष्ठ २१२-१३) और इससे उन्होंने 'चित्तको शान्तिका अनुभव' किया । (पृष्ठ ३७५)
गांधीजीने जिस तटस्थताके साथ जीवनकी घटनाओंका वर्णन किया है, उससे
प्रकट हो जाता है कि वे अपनेको शून्य बनानेकी साधनामें किस सीमा तक आगे
बढ़ चुके थे । यह तटस्थता कई बार गांधीजी के विनोदी स्वभावकी झांकी भी प्रस्तुत
करती है । जैसे उन्होंने लिखा : भंगी कामकी सेवाकी माँग तो मैंने की, किन्तु इसे
करने का बोझ मगनलाल गांधीको उठाना पड़ा (पृष्ठ २९६) । ” साथी मुझे दर्शनार्थियोंसे
सुरक्षित रखनेके लिए भारी प्रयत्न करते और विकल हो जाते; तब निश्चित समय
पर मुझे दर्शन देनेके लिए बाहर निकालनेके सिवाय कोई चारा न रह जाता।
(पृष्ठ ३१७) " त्रुटि स्वीकार" करते हुए व्यक्ति पश्चात्तापपूर्ण शब्दावलीकी जैसी
झड़ी लगा देता है, उसका सर्वथा अभाव और विनोदकी शक्तिका यह भाव समूची
पुस्तकमें एक निर्वैयक्तिक और तनावसे हीन शैलीका निर्माण कर देते हैं। विवरणकी
शैली में प्रामाणिकता इतनी स्पष्ट है कि पाठक आसानीसे समझ जाता है कि
भूतकालसे कौन-कौनसे पहलू कथा लिखते समय भी गांधीजीकी भावनामें साकार थे
और किन घटनाओंका असर बिलकुल निःशेष हो चुका था । उदाहरणके लिए
बाल्यावस्थाकी वे स्मृतियाँ जो रूढ़िगत बन्धनोंको तोड़नेके उनके प्रयत्न और उनके
बालविवाहसे सम्बन्धित थीं, गहरी भावना प्रदर्शित करती हैं। आत्मकथामें श्री जे०
जे० डोककी इस बातको पुष्ट करनेवाले अनेक स्थल हैं कि " जब कभी गांधीजी
अपने माता-पिताकी बात करते हैं, तो सुननेवालेको ऐसा मालूम होता है मानो वह
किसी पवित्र स्थान में खड़ा है।" ('एम० के० गांधी, एन इंडियन पेट्रियट इन साउथ
आफ्रिका', प्रकाशन विभाग, पृष्ठ २०) इसके विपरीत अगर हम लन्दनमें गांधीजीके