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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१५३

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

२०. बालासुन्दरम्

जैसी जिसकी भावना वैसा उसका फल । इस नियमको मैंने अपने बारेमें अनेक बार घटित होते देखा है । जनताकी अर्थात गरीबोंकी सेवा करनेकी मेरी प्रबल इच्छाने गरीबों के साथ मेरा सम्बन्ध हमेशा ही अनायास जोड़ दिया है ।

यद्यपि नेटाल इंडियन कांग्रेस में उपनिवेशों में पैदा हुए हिन्दुस्तानियोंने प्रवेश किया था और मुहर्रिरोंका समाज उसमें प्रवेश हुआ था, फिर भी मजदूरोंने, गिरमिटिया समाज के लोगोंने, उसमें प्रवेश नहीं किया था । कांग्रेस उनकी नहीं हुई थी। वे उसमें चन्दा देकर और दाखिल होकर उसे अपना नहीं सकते थे। उनके मनमें कांग्रेसके प्रति प्रेम तो तभी पैदा हो सकता था, जब कांग्रेस उनकी सेवा करे । ऐसा प्रसंग अपने आप आ गया और वह भी ऐसे समय जब कि मैं स्वयं अथवा कांग्रेस उसके लिए शायद ही तैयार थे। मुझे वकालत शुरू किये अभी मुश्किलसे दो चार महीने हुए थे। कांग्रेसका भी शैशव काल था । इतने में एक दिन बालासुन्दरम् नामका एक मद्रासी हिन्दुस्तानी हाथमें साफा लिये रोता-रोता मेरे सामने आकर खड़ा हो गया । उसके कपड़े फटे हुए थे, वह थर-थर काँप रहा था, उसके मुँहसे खून बह रहा था और उसके आगेके दो दाँत टूटे हुए थे । उसके मालिकने उसे बुरी तरह मारा था । तमिल समझनेवाले अपने मुहररके द्वारा मैंने उसकी स्थिति जान ली । बालासुन्दरम् एक प्रतिष्ठित गोरेके यहाँ मजदूरी करता था । मालिक किसी वजहसे गुस्सा हुआ होगा । वह कोमें आपा खो बैठा और उसने बालासुन्दरम्की बहुत ज्यादा पिटाई की । परिणामस्वरूप बालासुन्दरम् के दो दाँत टूट गये ।

मैंने उसे डाक्टरके यहाँ भेजा । उन दिनों गोरे डाक्टर ही मिलते थे । मुझे चोट-सम्बन्धी प्रमाणपत्रकी आवश्यकता थी । उसे प्राप्त करके मैं बालासुन्दरम्को मजिस्ट्रेट के पास ले गया। वहाँ बालासुन्दरमुका शपथ पत्र प्रस्तुत किया। उसे पढ़कर मजिस्ट्रेट मालिक पर गुस्सा हुआ। उसने मालिकके नाम समन जारी करनेका हुक्म दिया ।

मेरी नीयत मालिकको सजा करानेकी नहीं थी। मुझे तो बालासुन्दरम्‌को उसके पंजेसे छुड़ाना था । मैंने गिरमिटियोंसे सम्बन्ध रखनेवाले कानूनकी छान-बीन कर ली । यदि साधारण नौकर नौकरी छोड़ता, तो मालिक उसके खिलाफ दीवानी में दावा दायर कर सकता था, पर उसे फौजदारी में नहीं ले जा सकता था । गिरमिटमें और साधारण नौकरी में बहुत फर्क था । पर खास फर्क यह था कि अगर गिरमिटिया मालिकको छोड़े तो वह फौजदारी गुनाह माना जाता था, और उसके लिए उसे कैद भुगतनी होती थी । इसीलिए सर विलियम विल्सन हंटरने इस स्थितिको लगभग गुलामीकी-सी स्थिति माना था । गुलाम की तरह गिरमिटिया मालिककी मिल्कियत माना जाता था।

बालासुन्दरम्को छुड़ानेके केवल दो उपाय थे या तो गिरमिटियोंके लिए नियुक्त अधिकारी, जो कानूनकी दृष्टिसे उनका रक्षक कहा जाता था, उसका गिरमिट रद करे या दूसरेके नाम लिखवा दे, अथवा मालिक स्वयं उसे छोड़नेको तैयार हो