साफ रखनेका आलस्य, उनकी मरम्मत में कंजूसी, हमारे अलग-अलग धर्म - ये सारी बातें विरोधको भड़कानेवाली सिद्ध हुई ।
यह विरोध प्राप्त मताधिकारको छीन लेने और गिरमिटियों पर कर लगाने- वाले कानून के रूप में प्रकट हुआ । कानूनके बाहर तो अनेक प्रकारसे उन्हें परेशान करना शुरू हो ही चुका था ।
पहला सुझाव तो यह था कि गिरमिट पूरा होनेके कुछ दिन पहले ही हिन्दु- स्तानियोंको जबरदस्ती वापस भेज दिया जाये, ताकि उनके इकरारनामेकी मुद्दत हिन्दुस्तान में पूरी हो । पर इस सुझावको भारत सरकार माननेवाली नहीं थी । इसलिए यह सुझाव दिया गया कि :
१. मजदूरीका इकरार पूरा हो जाने पर गिरमिटिया वापस हिन्दुस्तान चला जाये; अथवा,
२. हर दूसरे साल नया गिरमिट लिखाये और उस हालत में हर बार उसके वेतनमें कुछ बढ़ोतरी की जाये ;
३. अगर वापस न जाये और मजदूरीका नया इकरारनामा भी न लिखे, तो हर साल २५ पौंडका कर दे ।
इन सुझावोंको स्वीकार कराने के लिए सर हेनरी बीन्स और श्री मेसनका शिष्टमण्डल हिन्दुस्तान भेजा गया । तब लॉर्ड एलविन वाइसराय थे। उन्होंने २५ पौंडका कर तो नामंजूर कर दिया; पर गिरमिटमुक्त हिन्दुस्तानीसे ३ पौंडका कर लेनेकी स्वीकृति दे दी। मुझे उस समय ऐसा लगा था और अब तक लगता है कि वाइसरायकी यह गम्भीर भूल थी। इसमें उन्होंने हिन्दुस्तानके हितका तनिक भी विचार नहीं किया | नेटालके गोरोंके लिए ऐसी सुविधा कर देना उनका कोई कर्त्तव्य नहीं था । तीन-चार साल के बाद यह कर हर वैसे (गिरमिट-मुक्त) हिन्दुस्तानीकी स्त्रीसे और उसके हर १६ साल और उससे बड़ी उम्र के लड़के और १३ साल या उससे बड़ी उम्र की लड़की से भी लेनेका निश्चय किया गया। इस प्रकार पति-पत्नी और दो बच्चोंवाले कुटुम्बसे, जिसमें पतिको अधिक-से-अधिक १४ शिलिंग प्रतिमास मिलते हों, १२ पौंड अर्थात् १८० रुपयेका कर लेना भारी जुल्म माना जायेगा। दुनिया में कहीं भी इस स्थितिके गरीब लोगोंसे ऐसा भारी कर नहीं लिया जाता था ।
इस कर के विरुद्ध जोरोंकी लड़ाई छिड़ी । यदि नेटाल इंडियन कांग्रेसकी ओरसे कोई आवाज ही न उठाई जाती, तो शायद वाइसराय २५ पौंड भी मंजूर कर लेते । यह पूरी तरह सम्भव है कि २५ पौंडके ३ पौंड होना भी कांग्रेस आन्दोलनका ही प्रताप हो, पर इस कल्पनामें मेरी मूल भी हो सकती है । सम्भव है कि भारत सरकारने २५ पौंडके प्रस्तावको शुरूसे ही अस्वीकार कर दिया हो, और हो सकता है कि कांग्रेसके विरोध न करने पर भी वह ३ पौंडका ही कर स्वीकार करती ।
१. देखिए खण्ड १, द्वितीय संस्करण पृष्ठ २४०-५४ ॥