मैं जिस परिवारमें हर रविवारको जाता था, कहना होगा कि वहाँसे तो मुझे छुट्टी ही मिल गई । घरकी मालकिन भोली भली परन्तु संकुचित मनकी मालूम हुई । हर बार उनके साथ कुछ-न-कुछ धर्म-चर्चा तो होती ही रहती थी। उन दिनों में घर पर 'लाइट ऑफ एशिया' पढ़ रहा था। एक दिन हम ईसा और बुद्धके जीवनकी तुलना करने लगे। मैंने कहा: “गौतमकी दयाको देखिए । यह मनुष्य जातिको लाँघकर दूसरे प्राणियों तक पहुँच गई थी । उनके कन्धे पर खेलते हुए मेमनेका चित्र आँखोंके सामने आते ही क्या आपका हृदय प्रेमसे उमड़ नहीं पड़ता ? प्राणिमात्रके प्रति ऐसा प्रेम मैं ईसाके चरित्रमें नहीं देख सका ।" उन बहनका दिल दुखा । मैं समझ गया । मैंने अपनी बात आगे न बढ़ाई। हम भोजनालय में पहुँचे । कोई पाँच वर्षका उनका हँसमुख बालक भी हमारे साथ था । मुझे बच्चे मिल जायें तो फिर और क्या चाहिए ? उनके साथ मैंने दोस्ती तो कर ही ली थी। मैंने उसकी थालीमें पड़े माँसके टुकड़ेका मजाक किया, और अपनी रकाबीमें सजे हुए सेवकी स्तुति शुरू की । निर्दोष बालक पिघल गया और सेवकी स्तुतिमें सम्मिलित हो गया ।
पर माता ? वह बेचारी दुखी हुई ।
मैं चेता । चुप्पी साध गया । मैंने चर्चाका विषय बदल दिया। दूसरे हफ्ते सावधान रहकर मैं उनके यहाँ गया तो सही, पर मेरे पाँव भारी पड़ गये थे । मुझे यह न सूझा कि मैं खुद ही वहाँ जाना बन्द कर दूं, और न ऐसा करना उचित जान पड़ा । पर उन मली बहनने मेरी कठिनाई दूर कर दी। वे बोलीं,
"श्री गांधी, आप बुरा न मानिएगा, पर मुझे आपसे कहना चाहिए कि मेरे बालक पर आपकी सोहबतका बुरा असर होने लगा है । अब वह रोज माँस खाने में आनाकानी करता है और आपकी उस चर्चाकी याद दिलाकर फल माँगता है ? मुझसे यह निभ न सकेगा । मेरा बच्चा मांसाहार छोड़ने से बीमार चाहे न पड़े, पर कमजोर तो हो ही जायेगा। इसे मैं कैसे सह सकती हूँ? आप जो चर्चा करते हैं, वह हम सयानोंके बीच शोमा दे सकती है। लेकिन बालकों पर तो उसका बुरा ही असर पड़ सकता है । "
" मिसेज ... मुझे दुःख है । माताके नाते मैं आपकी भावनाको समझ सकता । मेरे भी बच्चे हैं। इस आपत्तिका अन्त सरलतासे हो सकता है। मेरे बोलने का जो असर होगा, उसकी अपेक्षा मैं जो खाता हूँ या नहीं खाता हूँ, उसे देखने का असर बालक पर बहुत अधिक होगा। इसलिए अच्छा रास्ता तो यह है कि अब आगेसे मैं रविवार को आपके यहाँ न आऊँ । इससे हमारी मित्रतामें कोई बाधा न पहुँचेगी । "
बनने प्रसन्न होकर उत्तर दिया, "मैं आपका आभार मानती हूँ ।"
१. मूलमें यहाँ नाम नाम दिया गया है।