उस रसोइएको शायद नहीं जानता था, इसलिए उस कामके लिए उसका मेरे यहाँ रखा जाना सम्भव नहीं था । पर उसके आये बिना दूसरा कोई मुझे जाग्रत नहीं कर सकता था । वह स्त्री मेरे घरमें पहली ही बार आई हो, सो बात नहीं। पर इस रसोइए जितनी हिम्मत दूसरोंको हो ही कैसे सकती थी ? इस साथी के प्रति मेरे बेहद विश्वाससे सब लोग परिचित थे ।
इतनी सेवा करके रसोइएने उसी दिन और उसी क्षण जानेकी इजाजत चाही । वह बोला : “ मैं आपके घर में नहीं रह सकता। आप भोले भण्डारी ठहरे । यहाँ मेरा काम नहीं । "
मैंने आग्रह नहीं किया ।
उक्त मुहर्रिर पर शक पैदा करानेवाला यह साथी ही था, यह बात मुझे अब मालूम हुई। उसके साथ हुए अन्यायको मिटानेका मैंने बहुत प्रयत्न किया, पर मैं उसे पूरी तरह सन्तुष्ट न कर सका। मेरे लिए यह सदा ही दुःखकी बात रही । फूटे बर्तनको कितना ही पक्का क्यों न जोड़ा जाये, वह जोड़ा हुआ ही कहलायेगा, सम्पूर्ण कभी नहीं होगा ।
२४. देशकी ओर
अब मैं दक्षिण आफ्रिका में तीन साल रह चुका था । मैं लोगोंको पहचानने लगा था और वे मुझे पहचानने लगे थे । सन् १८९६ में मैंने छः महीनोंके लिए देश जानेकी इजाजत मांगी। मैंने देखा कि मुझे दक्षिण आफ्रिकामें लम्बे समय तक रहना होगा । कहा जा सकता है कि मेरी वकालत ठीक चल रही थी । सार्वजनिक काम में लोग मेरी उपस्थितिकी आवश्यकता अनुभव कर रहे थे; मैं भी करता था । इससे मैंने दक्षिण आफ्रिका में सपरिवार रहनेका निश्चय किया और उसके लिए देश हो आना ठीक समझा। फिर, मैंने यह भी देखा कि देश जानेसे कुछ सार्वजनिक कार्य भी हो सकता है । मुझे लगा कि देशमें लोकमत जाग्रत करके यहाँके भारतीयोंके प्रश्नमें लोगोंकी अधिक दिलचस्पी पैदा की जा सकती है। तीन पौंडका कर एक नासूर था -- सदा बहनेवाला घाव था। जबतक वह रद न हो, चित्तको शान्ति नहीं मिल सकती थी ।
लेकिन मेरे देश जाने पर कांग्रेसका और शिक्षा मण्डलका काम कौन सँभाले ? दो साथियोंपर मेरी दृष्टि पड़ी -- आदमजी मियांखाँ और पारसी रुस्तमजी । व्यापारी समाजमें बहुत-से काम करनेवाले निकल आये थे, पर मन्त्रीका काम सँभाल सकने, नियमित काम करने और दक्षिण आफ्रिकामें जन्मे हुए हिन्दुस्तानियोंका मन जीत सकनेकी योग्यता रखनेवालोंमें ये दो प्रथम पंक्ति में खड़े किये जा सकते थे । मन्त्री के लिए साधारण अंग्रेजी जाननेकी जरूरत तो थी ही। मैंने इन दो में से स्व० आदमजी मियाँखाँको मन्त्रिपद देनेकी सिफारिश कांग्रेससे की और वह स्वीकार की