तेरह
अपरिग्रहके सिद्धान्तसे तो उनका परिचय था ही । परिणामतः उन्होंने तुरन्त ही उक्त पुस्पकमें प्रतिपादित विचारोंको कार्यान्वित करनेका निश्चय किया । असंग्रहके इस आदर्श को अमली रूप देनेके लिए उन्होंने फीनिक्स आश्रमके अपने सहयोगियोंके साथ नितान्त सीधा-सादा जीवन बिताना प्रारम्भ कर दिया। जैसे-जैसे गांधीजीका आध्यात्मिक विकास होता गया, वैसे-वैसे उन्होंने आश्रम में नैतिक अनुशासन बढ़ाया और उन्होंने आश्रम- जीवनकी आचार संहिता तैयार की। संहिताका आधार था प्राचीन भारतके आरण्यक ऋषियोंका जीवन । अभी तक गांधीजी आहार-सम्बन्धी जो प्रयोग करते थे, वे स्वास्थ्य की दृष्टिसे करते थे । इस अवधि में उनका हेतु बदलकर नैतिक हो गया तथा उनका उपयोग आत्म-संयमकी दिशा में किया जाने लगा। उन्होंने सोचा कि उपनिषद-कालके ऋषि और द्रष्टा भी क्या फलाहार करके हो नहीं रहते थे और क्या उनका वासना- हीन जीवन इसका फल नहीं था ।
गांधीजीने इस अवधि में सबसे महत्वपूर्ण जो निश्चय किया वह था उनका भविष्य में आजन्म ब्रह्मचर्य पालन करने का व्रत । उन्होंने लिखा है कि मैं यह नहीं जानता कि मेरे मन में इस व्रतका विचार पहले कब आया । (पृष्ठ १५८-५९) किन्तु यह बात वे निश्चयपूर्वक कह पाये हैं कि १९०६ में जुलू विद्रोहके समय जब वे भारतीय आहत सहायक सेवक दलका नेतृत्व कर रहे थे, उन दिनों उन्हें जो अनुभव हुए, उन अनुभवोंका इस अन्तिम निर्णय तक पहुँचने में हाथ था । (पृष्ठ १६०) हिन्दू धर्मकी जिस परम्परामें हनुमान रामके आदर्श सेवक माने गये हैं, उस परम्परामें उन्होंने सोचकर देखा और उन्हें प्रतीति हो गई कि सेवा और आध्यात्मिक विकास अपने व्यापक अर्थ में परिपूर्ण ब्रह्मचर्य के बिना साध्य नहीं हैं और इसलिए इस व्रतने गांधीजीके आध्यात्मिक प्रयत्नोंमें केन्द्रीय स्थान प्राप्त कर लिया। (पृष्ठ २४२-४३ ) इस व्रतने उनके सामने मनुष्यके प्रयत्नोंकी व्यर्थता और प्रकृतिके दुर्निवार होनेके तथ्य को प्रतीत कराई और आत्मशुद्धिके साधन के रूपमें प्रार्थना और उनकी अपनी हद तक रामनामकी शक्तिको उन्होंने एकमात्र आधार माना । प्रार्थना की शक्तिमें उनका यह विश्वास बढ़ता ही चला गया। (पृष्ठ २४३ और २६३ )
आत्मकथा में गांधीजीने अपने पुत्रोंको शिक्षासे सम्बन्धित समस्याका थोड़े विस्तारसे वर्णन किया है। पहले तो उन्होंने देशके प्रति अपने प्रेमके कारण यह देखा कि अधिकांश भारतीय बच्चे अंग्रेजी माध्यम से चलनेवाले विद्यालयोंमें गरीबीके कारण शिक्षा नहीं पा सकते। उन्होंने इसीलिए अपने बच्चोंको भी उस प्रकारकी शिक्षासे वंचित रखना उचित समझा। (पृष्ठ १५४) इसके बाद जीवन सम्बन्धी उनका दृष्टिकोण बदल गया, आधुनिक सभ्यतापर से उनका विश्वास उठ गया और यह सभ्यता जिन पार्थिव मूल्यों पर आधारित थी, विद्यालयीन शिक्षणकी वस्तु और पद्धति उनसे प्रभावित होनेके कारण गांधीजीका रुख उस प्रकारके शिक्षणके विरुद्ध हो गया । बुद्धिके रूढ़िगत प्रशिक्षण और केवल पुस्तकीय ज्ञानके बदले उन्होंने चरित्र-गठन, शारीरिक