सर फीरोजशाहको मेरा भाषण अच्छा लगा। मुझे गंगा नहानेका-सा सन्तोष हुआ ।
इस सभाके परिणामस्वरूप देशपाण्डे और एक पारसी सज्जनकी इच्छा हुई और दोनोंने मेरे साथ दक्षिण आफ्रिका जानेका अपना निश्चय प्रकट किया। पारसी सज्जन आज एक सरकारी पदाधिकारी हैं, इसलिए उनका नाम प्रकट करते हुए मैं डरता हूँ। उनके निश्चयको सर खुरशेदजीने डिगा दिया, और उस डिगनेके मूलमें एक पारसी बहन थीं । उनके सामने प्रश्न था : ब्याह करें या दक्षिण आफ्रिका जायें ? उन्होंने व्याह करना अधिक उचित समझा । पर इन पारसी मित्रकी ओरसे पारसी रुस्तमजीने प्रायश्चित्त किया, और पारसीबहनकी तरफका प्रायश्चित्त दूसरी पारसी बहनें सेविकाका काम करके और खादीके पीछे वैराग्य लेकर कर रही हैं । इसलिए इस दम्पतीको मैंने क्षमा कर दिया है | देशपाण्डेके सामने व्याहका प्रलोभन न था, पर वे नहीं आ सके। उसका प्रायश्चित्त तो वे खुद ही कर रहे हैं। वापस दक्षिण आफ्रिका जाते समय जंजीबारमें तैयबजी नामके एक सज्जन मिले थे। उन्होंने भी आनेकी आशा बँधाई थी। पर वे दक्षिण आफ्रिका क्यों आने लगे ? उनके न आनेके अपराधका बदला अब्बास तैयबजी चुका रहे हैं। बैरिस्टर मित्रोंको दक्षिण आफ्रिका आनेके लिए ललचानेके मेरे प्रयत्न इस प्रकार निष्फल हुए ।
यहाँ मुझे पेस्तनजी पादशाहकी याद आ रही है । उनके साथ विलायतसे ही मेरा मीठा सम्बन्ध हो गया था । पेस्तनजीसे मेरा परिचय लन्दनके एक अन्नाहारी भोजनालय में हुआ था । मैं जानता था कि उनके भाई बरजोरजी 'दीवाना' के नाम से प्रख्यात थे। मैं उनसे मिला नहीं था, पर मित्र मण्डलीका कहना था कि वे 'सनकी' हैं । घोड़ेपर दया करके ट्राम में नहीं बैठते थे । शतावधानीके समान स्मरणशक्ति होते हुए भी डिग्रियाँ नहीं लेते थे । स्वभावके इतने स्वतन्त्र कि किसीसे भी दबते न थे । और पारसी होते हुए भी अन्नाहारी थे! पेस्तनजी ठीक वैसे नहीं माने जाते थे पर उनकी होशियारी प्रसिद्ध थी। उनकी यह ख्याति विलायत में भी थी । किन्तु हमारे बीचके सम्बन्धका मूल तो उनका अन्नाहार था । उनकी बुद्धिमत्ताकी बराबरी करना मेरी शक्तिके बाहर था ।
बम्बई में मैंने पेस्तनजीको खोज निकाला । वे हाईकोर्टके प्रोथोनोटरी (मुख्य लेखक ) थे। मैं जब मिला तब वे बृहत् गुजराती शब्दकोशके काम में लगे हुए थे । दक्षिण आफ्रिका काममें मदद मांगनेकी दृष्टिसे मैंने एक भी मित्रको छोड़ा नहीं था । पेस्तनजी पादशाहने तो मुझे भी दक्षिण आफ्रिका न जानेकी सलाह दी । बोले :
मुझसे आपकी मदद तो क्या होगी ? पर मुझे आपका दक्षिण आफ्रिका लौटना ही पसन्द नहीं है । यहाँ अपने देश में ही कौन कम काम है ? देखिए, अपनी भाषाकी ही सेवाका कितना बड़ा काम पड़ा है? मुझे विज्ञान-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दोंके पर्याय ढूंढ़ने हैं । यह तो एक ही क्षेत्र हुआ । देशकी गरीबीका विचार कीजिए । दक्षिण आफ्रिकामें हमारे भाई कष्टमें अवश्य हैं, पर उसमें आपके जैसे आदमीका खप जाना मैं सहन नहीं कर सकता । यदि हम यहाँ अपने हाथमें राजसत्ता ले लें,