{{rh|१४०| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}
तो वहाँ उनकी मदद अपने-आप हो जायेगी। आपको तो मैं समझा नहीं सकता, पर आपके जैसे दूसरे सेवकोंको आपके साथ कराने में मैं कभी मदद नहीं करूँगा ।"
मुझे ये वचन अच्छे न लगे। पर पेस्तनजी पादशाह के प्रति मेरा आदर बढ़ गया। उनका देशप्रेम और भाषा-प्रेम देखकर मैं मुग्ध हो गया। इस प्रसंगसे हमारे बीचको प्रेमगाँठ अधिक पक्की हो गई । मैं उनके दृष्टिकोणको अच्छी तरह समझ गया । पर मुझे लगा कि दक्षिण आफ्रिकाका काम छोड़नेके बदले उनकी दृष्टिसे भी मुझे उसमें अधिक जोरसे लगे रहना चाहिए। देशभक्तको देशसेवाके एक भी अंगकी यथासम्भव उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और मेरे लिए तो गीताका यह श्लोक तैयार ही था :
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ( ३, ३५ )
ऊँचे परधर्मसे नीचा स्वधर्मं अच्छा है । स्वधर्ममें मौत भी अच्छी है, परधर्म तो भयावह है ।
२८. पूना और मद्रास
सर फीरोजशाह मेहताने मेरा मार्ग सरल कर दिया था । बम्बईसे मैं पूना गया। मुझे मालूम था कि पूनामें दो दल थे। मुझे तो सबकी मददकी जरूरत थी । मैं लोकमान्य तिलकसे मिला। उन्होंने कहा :
'सब पक्षोंकी मदद लेनेका आपका विचार बिलकुल ठीक है । आपके मामले में कोई मतभेद हो ही नहीं सकता। लेकिन आपके लिए तटस्थ सभापति चाहिए। आप प्रो० भाण्डारकरसे मिलिए। वे आजकल किसी आन्दोलन में सम्मिलित नहीं होते । पर सम्भव है कि इस कामके लिए आगे आ जायें। उनसे मिलनेके बाद मुझे सूचित कीजिए, क्या हुआ । मैं आपकी पूरी मदद करना चाहता हूँ । आप प्रो० गोखलेसे तो मिलेंगे ही। मेरे पास आप जब आना चाहें, निःसंकोच आइए ।
लोकमान्यका यह मेरा प्रथम दर्शन था । मैं उनकी लोकप्रियताका कारण तुरन्त समझ गया ।
यहाँ से मैं गोखलेके पास गया। वे फर्ग्यूसन कालेज में थे। मुझसे बड़े प्रेमसे मिले और मुझे अपना बना लिया। उनसे भी मेरा यह पहला ही परिचय था । पर ऐसा जान पड़ा, मानो हम पहले मिल चुके हों। सर फीरोजशाह मुझे हिमालय जैसे, लोकमान्य समुद्र जैसे और गोखले गंगा-जैसे लगे । मैं गंगा में नहा सकता था । हिमालय पर चढ़ा नहीं जा सकता था। समुद्र में डूबनेका डर था । गंगाकी गोद में तो खेला जा सकता था । उसमें डोंगियाँ लेकर सैर की जा सकती थी । गोखलेने बारीकी से
१. पूना यात्रा के अन्य विवरणोंके लिए देखिए खण्ड २९ पृष्ठ ४१-३ और खण्ड २०, पृष्ठ ३८२-८६।