सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१७३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१४१
सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

मेरी जाँच की -- उसी तरह, जिस तरह स्कूलमें भरती होते समय किसी विद्यार्थी की की जाती है। उन्होंने मुझे बताया कि मैं किस-किससे और कैसे मिलूं और मेरा भाषण देखनेको माँगा । मुझे कालेजकी व्यवस्था दिखाई। जब जरूरत हो तब फिर मिलनेको कहा । डा० भाण्डारकरके जवाबकी खबर देने को कहा और मुझे विदा किया। राजनीतिके क्षेत्रमें जो स्थान गोखलेने जीते-जी मेरे हृदय में प्राप्त किया, और स्वर्गवासके बाद आज भी जो स्थान उन्हें प्राप्त है, वह और कोई पा नहीं सका ।

रामकृष्ण भण्डारकरने मेरा वैसा ही स्वागत किया, जैसा कोई बाप बेटेका करता है। उनके यहाँ गया तब दुपहरीका समय था । ऐसे समय में भी मैं अपना काम कर रहा था, यह चीज ही उस उद्यमी शास्त्रज्ञको प्यारी लगी । और तटस्थ सभापतिके लिए मेरे आग्रहकी बात सुनकर 'देट्स इट, देट्स इट' (यही ठीक है, यही ठीक है) के उद्गार उनके मुंहसे सहज ही निकल पड़े ।

बातचीतके अन्त में वे बोले, तुम किसीसे भी पूछोगे तो वह बतलायेगा कि आजकल मैं किसी राजनीतिक काममें हिस्सा नहीं लेता हूँ, पर तुम्हें मैं खाली हाथ नहीं लौटा सकता । तुम्हारा मामला इतना मजबूत है, और तुम्हारा उद्यम इतना स्तुत्य है कि मैं तुम्हारी सभामें आनेसे इनकार कर ही नहीं सकता । यह अच्छा हुआ कि तुम श्री तिलक और श्री गोखलेसे मिल लिये। उनसे कहो कि मैं दोनों पक्षों द्वारा बुलाई गई सभामें खुशीसे आऊँगा और सभापति पद स्वीकार करूँगा । समयके बारेमें मुझसे पूछने की जरूरत नहीं है। दोनों पक्षोंको जो समय अनुकूल होगा, मुझे वह अनुकूल होगा । " यों कहकर उन्होंने धन्यवाद और आशीर्वादके साथ मुझे विदा किया ।

बिना किसी हो-हल्ले और आडम्बरके एक सादे मकानमें पूनाकी इस विद्वान और त्यागी मण्डलीने सभा की और मुझे सम्पूर्ण प्रोत्साहनके साथ विदा किया ।

वहाँ से मैं मद्रास गया । मद्रास तो पागल हो उठा । बालासुन्दरम् के किस्सेका सभापर गहरा असर पड़ा। मेरे लिए मेरा भाषण अपेक्षाकृत लम्बा था । पूरा छपा हुआ था । पर समाने उसका एक-एक शब्द ध्यानपूर्वक सुना । सभाके अन्तमें उस हरी पुस्तिका' पर लोग टूट पड़े । मद्रास में संशोधन और परिवर्धनके साथ उसकी दस हजारकी दूसरी आवृत्ति छपाई थी । उसका अधिकांश निकल गया । पर मैंने देखा कि दस हजारकी जरूरत नहीं थी। मैंने लोगोंके उत्साहका कुछ अधिक अन्दाज लगा लिया था । मेरे भाषणका प्रभाव तो अंग्रेजी जाननेवाले समाज पर ही पड़ा था । उस समाज के लिए अकेले मद्रास शहरमें दस हजार प्रतियोंकी आवश्यकता नहीं हो सकती थी ।

यहाँ मुझे सबसे अधिक मदद स्व० जी० परमेश्वरन् पिल्लेसे मिली । वे 'मद्रास स्टैंडर्ड' के सम्पादक थे । उन्होंने इस प्रश्नका अच्छा अध्ययन कर लिया था। वे मुझे अपने दफ्तर में समय-समय पर बुलाते और मेरा मार्गदर्शन करते रहते थे । 'हिन्दू' के जी० सुब्रह्मण्यमुसे भी मैं मिला था । उन्होंने और डा० सुब्रह्मण्यमने भी पूरी सहानुभूति

१. देखिए खण्ड २, पृ४ १०१-३३ ।