सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१७४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

{{rh|१४२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}

दिखाई थी। पर जी० परमेश्वरन् पिल्लेने तो मुझे इस कामके लिए अपने समाचार- पत्रका मनचाहा उपयोग करने को कहा, और मैंने निःसंकोच उसका उपयोग किया भो । सभा पाच्याप्पा हालमें हुई थी और मेरा ख्याल है कि डा० सुब्रह्मण्यम् उसके सभापति बने थे ।

मद्रास में सबके साथ विशेषकर अंग्रेजीमें ही बोलना पड़ता था, फिर भी मैंने बहुतोंसे इतना प्रेम और उत्साह पाया कि मुझे घर जैसा ही लगा । प्रेम किन बन्धनों को नहीं तोड़ सकता ?

२९. ' जल्दी लौटिए '

मद्रास से मैकलकत्ते गया । कलकत्ते में मेरी कठिनाइयोंका पार न रहा । वहाँ मैं 'ग्रेट ईस्टर्न' होटल में ठहरा। किसीसे जान-पहचान नहीं थी । होटलमें 'डेली टेलीग्राफ' के प्रतिनिधि श्री एलर था से पहिचान हुई । वे बंगाल क्लबमें रहते थे । उन्होंने मुझे वहाँ आनेके लिए न्योता । उस समय उन्हें पता नहीं था कि होटलके दीवानखाने में किसी हिन्दुस्तानीको नहीं ले जाया जा सकता । बाद में उन्हें इस प्रतिबन्धका पता चला। इससे वे मुझे अपने कमरे में ले गये । हिन्दुस्तानियोंके प्रति स्थानीय अंग्रेजोंका तिरस्कार देखकर उन्हें खेद हुआ। मुझे दीवानखाने में न ले जानेके लिए उन्होंने क्षमा माँगी ।

'बंगालके आराध्य देव ' सुरेन्द्रनाथ बेनर्जीसे तो मुझे मिलना ही था । उनसे मिला । जब मैं मिला, उनके आसपास दूसरे मिलनेवाले भी बैठे थे । उन्होंने कहा :

मुझे डर है कि लोग आपके काम में रस नहीं लेंगे । आप देखते हैं कि देशमें ही कुछ कम विडम्बनाएँ नहीं हैं । फिर भी आपसे जो हो सके अवश्य कीजिए । इस काम में आपको महाराजाओंकी मददकी जरूरत होगी। आप ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन के प्रतिनिधियोंसे मिलिए; राजा सर प्यारीमोहन मुखर्जी और महाराजा टैगोरसे भी मिलियेगा । दोनों उदार वृत्तिके हैं, और सार्वजनिक कामोंमें काफी हिस्सा लेते हैं । '

मैं इन सज्जनोंसे मिला । वहाँ मेरी दाल न गली । दोनोंने कहा, " कलकत्तेमें सार्वजनिक सभा करना आसान काम नहीं है । पर करनी ही हो, तो उसका बहुत- कुछ आधार सुरेन्द्रनाथ बेनर्जी पर होगा । "

मेरी कठिनाइयाँ बढ़ती जा रही थीं । मैं 'अमृतबाजार पत्रिका ' के कार्यालय में गया। वहाँ भी जो सज्जन मुझे मिले उन्होंने यह मान लिया था कि मैं कोई रमता- राम हूँ । 'बंगवासी' ने तो हद कर दो। मुझे एक घंटे तक बैठाये रखा । सम्पादक महोदय दूसरोंके साथ बातचीत करते जाते थे । लोग आते-जाते रहते थे, पर सम्पादकजी मेरी तरफ देखते भी न थे। एक घंटे तक राह देखनेके बाद जब मैंने अपनी बात छेड़ी, तो उन्होंने कहा, "आप देखते नहीं हैं, हमारे पास कितना काम पड़ा है ? आप जैसे तो कई हमारे यहाँ आते रहते हैं । आप वापस जायें यही अच्छा है ।