मैंने जवाब दिया, "इस विषय में मेरे विचार पक्के हो चुके हैं। यह निश्चय समझिए कि मुझे किसी पर मुकदमा नहीं चलाना है, इसलिए मैं आपको यहीं लिखकर दे देना चाहता हूँ ।"
यह कहकर मैंने आवश्यक पत्र लिखकर दे दिया।
४. शान्ति
हमले के दो-एक दिन बाद जब मैं श्री एस्कम्बसे मिला तब मैं पुलिस थाने में ही था । रक्षाके लिए मेरे साथ एक-दो सिपाही रहते थे, पर दरअसल जब मुझे श्री एस्कम्बके पास ले जाया गया तब रक्षाकी आवश्यकता रही नहीं थी ।
जिस दिन मैं जहाजसे उतरा उसी दिन, अर्थात् पीला झंडा उतरनेके बाद तुरन्त, 'नेटाल एडवर्टाइजर' नामक पत्रका प्रतिनिधि मुझसे मिल गया था । उसने मुझे कई प्रश्न पूछे थे, और उनके उत्तरमें मैं प्रत्येक आरोपका पूरा-पूरा जवाब दे सका था । सर फीरोजशाह मेहताकी कृपासे उस समय मैंने हिन्दुस्तानमें एक भी भाषण बिना लिखे नहीं किया था । अपने उन सब भाषणों और लेखोंका संग्रह तो मेरे पास था ही। मैंने वह सब उसे दिया और सिद्ध कर दिखाया कि मैंने हिन्दुस्तान में ऐसी एक भी बात नहीं कही, जो अधिक तीव्र शब्दों में दक्षिण आफ्रिकामें न कही हो। मैंने यह भी बता दिया कि 'कूरलैंड' और 'नादरी ' के यात्रियोंको लानेमें मेरा हाथ बिलकुल न था । उनमें अधिकतर तो पुराने ही थे, और बहुतेरे नेटालमें रहने- वाले नहीं, बल्कि ट्रान्सवाल जानेवाले थे । उन दिनों नेटालमें मन्दी थी । ट्रान्सवालमें बहुत अधिक कमाई होती थी । इस कारण अधिकतर हिन्दुस्तानी वहीं जाना पसन्द करते थे ।
इस खुलासेका और हमलावरों पर मुकदमा दायर करनेसे मेरे इन्कार करनेका असर इतना ज्यादा पड़ा कि गोरे शरमिन्दा हुए। समाचारपत्रोंने मुझे निर्दोष सिद्ध किया और हुल्लड़ करनेवालोंकी निन्दा की। इस प्रकार परिणाममें तो मुझे लाभ ही हुआ और मेरा लाभ मेरे कार्यका ही लाभ था । इससे भारतीय समाजकी प्रतिष्ठा बढ़ी और मेरा मार्ग अधिक सरल हो गया ।
तीन या चार दिन बाद मैं अपने घर गया और कुछ ही दिनोंमें व्यवस्थित रीतिसे अपना कामकाज करने लगा । इस घटनाके कारण मेरी वकालत भी बढ़ गई ।
परन्तु इस तरह यदि हिन्दुस्तानियोंकी प्रतिष्ठा बढ़ी, तो उनके प्रति गोरोंका द्वेष भी बढ़ा। गोरोंको विश्वास हो गया कि हिन्दुस्तानियों में दृढ़तापूर्वक लड़नेकी शक्ति
१. देखिए खण्ड २, पृष्ठ १७९ ।
२. भेंटके विवरणके लिए देखिए खण्ड २, पृष्ठ १६६-१७८ ।
३. तत्कालीन समाचारपत्रोंकी खबर के अनुसार पुलिस स्टेशनमें एक दिन रहनेके बाद गांधीजी अपने निवास 'बीच ग्रुप' भेज दिये गये थे। पुलिस स्टेशनके ऊपर की मंजिल में श्री अलेक्जेंडरने उन्हें अफसरोंके निवासमें जगह दी थी।