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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१८५

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

है । फलतः उनका डर बढ़ गया। नेटालकी धारासभा में दो कानून पेश हुए, जिससे हिन्दुस्तानियोंकी कठिनाइयाँ बढ़ गईं। एकसे भारतीय व्यापारियोंके धन्धेको नुकसान पहुँचा, दूसरे हिन्दुस्तानियोंके आने-जाने पर अंकुश लग गया । सौभाग्यसे मताधिकारकी लड़ाईके समय यह फैसला हो चुका था कि हिन्दुस्तानियोंके खिलाफ हिन्दुस्तानीके नाते कोई कानून नहीं बनाया जा सकता । मतलब यह कि कानूनमें रंगभेद या जातिभेद नहीं होना चाहिए। इसलिए ऊपरके दोनों कानून उनकी भाषाको देखते हुए तो सबपर लागू होते जान पड़ते थे, पर उनका मूल उद्देश्य केवल हिन्दुस्तानी कौम पर दबाव डालना था।

इन कानूनोंने मेरा काम बहुत बढ़ा दिया । इनसे हिन्दुस्तानियोंमें जागृति भी बढ़ी। हिन्दुस्तानियोंको ये कानून इस तरह समझा दिये गये कि इनकी बारीकसे बारीक बातोंसे भी कोई हिन्दुस्तानी अपरिचित न रह पापे । हमने उनके अनुवाद भी प्रकाशित कर दिये। झगड़ा आखिर विलायत पहुँचा । पर कानून नामंजूर नहीं हुए ।

मेरा अधिकतर समय सार्वजनिक काममें ही बीतने लगा । मनसुखलाल नाजर मेरे साथ रहे। उनके नेटालमें होनेकी बात मैं ऊपर लिख चुका हूँ । वे सार्वजनिक काममें अधिक हाथ बँटाने लगे, जिससे मेरा काम कुछ हलका हो गया ।

मेरी अनुपस्थिति में सेठ आदमजी मियाँखाँने अपने मन्त्रिपदको खूब सुशोभित किया था। उन्होंने सदस्य बढ़ाये थे और स्थानीय कांग्रेसके कोषमें लगभग एक हजार पौंडकी वृद्धि की थी। यात्रियों पर हुए हमलेका कारण और उपर्युक्त कानूनोंके कारण जो जागृति पैदा हुई, उससे मैंने इस वृद्धिमें भी वृद्धि करनेका विशेष प्रयत्न किया और कोषमें लगभग पाँच हजार पौंड जमा हो गये। मेरे मनमें लोभ यह था कि यदि कांग्रेसका स्थायी कोष हो जाये, उसके लिए जमीन ले ली जाये और उसका भाड़ा आने लगे तो कांग्रेस निश्चिन्त हो जाये । सार्वजनिक संस्थाका यह मेरा पहला अनुभव था । मैंने अपना विचार साथियोंके सामने रखा। उन्होंने उसका स्वागत किया । मकान खरीदे गये और वे भाड़ेपर उठा दिये गये । उनके किरायेसे कांग्रेसका मासिक खर्च आसानीसे चलने लगा । सम्पत्तिका सुदृढ़ ट्रस्ट बन गया। वह सम्पत्ति आज भी मौजूद है, पर अन्दर ही अन्दर वह आपसी कलहका कारण बन गई है और जायदादका किराया आज अदालतमें जमा होता है ।

यह दुःखद घटना तो मेरे दक्षिण आफ्रिका छोड़नेके बाद घटी, पर सार्वजनिक संस्थाओंके लिए स्थायी कोष रखनेके सम्बन्धमें मेरे विचार दक्षिण आफ्रिकामें ही बदल चुके थे । अनेकानेक सार्वजनिक संस्थाओंके निर्माण और उनके प्रबन्धकी जिम्मेदारी सँभालनेके बाद मैं इस दृढ़ निर्णय पर पहुँचा हूँ कि किसी भी सार्वजनिक संस्थाको स्थायी कोषपर निभनेका प्रयत्न नहीं करना चाहिए। इसमें उसकी नैतिक अधोगतिका बीज छिपा रहता है। सार्वजनिक संस्थाका अर्थ है, लोगोंकी स्वीकृति और लोगोंके घनसे चलनेवाली संस्था । ऐसी संस्थाको जब लोगोंकी सहायता न मिले, तो उसे जीवित रहनेका अधिकार ही नहीं रहता । देखा यह गया है कि स्थायी सम्पत्तिके भरोसे चलनेवाली संस्था लोकमत से मुक्त हो जाती है, और कितनी ही बार वह