अनियमित था । मैं अपनी रुचिके अनुकूल गुजराती शिक्षक नहीं खोज सका । मैं परेशान हुआ । मैंने ऐसे अंग्रेजी शिक्षकके लिए विज्ञापन दिया, जो बच्चोंको मेरी रुचिके अनुकूल शिक्षा दे सके। मैंने सोचा कि इस तरह जो शिक्षक मिलेगा उसके द्वारा थोड़ी नियमित शिक्षा होगी और बाकी मैं स्वयं, जैसे बन पड़ेगी, दूंगा। एक अंग्रेज महिलाको ७ पौंडके वेतनपर रखकर गाड़ी कुछ आगे बढ़ाई। बच्चोंके साथ मैं केवल गुजरातीमें ही बातचीत करता था। इससे उन्हें थोड़ी गुजराती सीखनेको मिल जाती थी । मैं उन्हें देश भेजनेके लिए तैयार न था । उस समय भी मेरा यह ख्याल था कि छोटे बच्चोंको माता-पितासे अलग नहीं रहना चाहिए। सुव्यवस्थित घरमें बालकोंको जो शिक्षा सहज ही मिल जाती है, वह छात्रालयोंमें नहीं मिल सकती । अतएव अधिकतर वे मेरे साथ ही रहे । भानजे और बड़े लड़केको मैंने कुछ महीनोंके लिए देशमें अलग-अलग छात्रालयोंमें भेजा अवश्य था, पर वहाँसे उन्हें तुरन्त वापस बुला लिया था । बादमें मेरा बड़ा लड़का, वयस्क होने पर, अपनी इच्छासे अहमदाबादके हाईस्कूल में पढ़नेके लिए दक्षिण आफ्रिका छोड़कर देश चला गया था । अपने भानजे को जो शिक्षा मैं दे सका, उससे उसे सन्तोष था, ऐसा मेरा ख्याल है । भरी जवानीमें, कुछ ही दिनोंकी बीमारीके बाद, उसका देहान्त हो गया। मेरे दूसरे तीन लड़के कभी किसी स्कूलमें गये ही नहीं । दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहके सिलसिलेमें मैंने जो विद्यालय खोला था, उसमें उन्होंने थोड़ी नियमित पढ़ाई की थी।
मेरे ये प्रयोग अपूर्ण थे। लड़कोंको मैं स्वयं जितना समय देना चाहता था उतना दे नहीं सका । इस कारण और दूसरी अनिवार्य परिस्थितियोंके कारण मैं अपनी इच्छाके अनुसार उन्हें किताबीज्ञान नहीं दे सका। इस विषयमें मेरे सब लड़कोंको न्यूनाधिक मात्रामें मुझसे शिकायत भी रही है। क्योंकि जब-जब वे 'बी० ए', 'एम० ए०' और 'मैट्रिक्युलेट' के भी सम्पर्क में आते, तब स्वयं किसी स्कूलमें न पढ़ सकनेकी कमीका अनुभव करते ।
तिसपर भी मेरी अपनी राय यह है कि जो अनुभव-ज्ञान उन्हें मिला है, माता- पिताका जो सहवास वे प्राप्त कर सके हैं, स्वतन्त्रताका जो पदार्थ-पाठ उन्हें सीखनेको मिला है, यदि मैंने उनको चाहे जिस तरह स्कूल भेजनेका आग्रह रखा होता तो वह सब उन्हें न मिलता । उनके बारेमें जो निश्चिन्तता आज मुझे है वह न होती, और जो सादगी तथा सेवाभाव उन्होंने आत्मज्ञान किया वह मुझसे अलग रहकर विलायत में या दक्षिण आफ्रिकामें कृत्रिम शिक्षा प्राप्त करके वे न कर पाते; बल्कि उनकी बनावटी रहन-सहन देश - कार्यमें मेरे लिए कदाचित् विघ्नरूप हो जाती । अतएव यद्यपि मैं उन्हें जितनी चाहता था उतनी किताबी शिक्षा नहीं दे सका, तो भी अपने पिछले वर्षोंका विचार करते समय मेरे मनमें यह खयाल नहीं उठता कि उनके प्रति मैंने अपने धर्मका यथाशक्ति पालन नहीं किया, और न मुझे उसके लिए पश्चात्ताप होता है । इसके विपरीत, अपने बड़े लड़केमें मैं जो दुःखद बातें देखता हूँ, वह मेरे अधकचरे
१. हरिलाल गांधी ट्रान्सवालमें पिताका घर छोड़कर सन् १९११ में भारत आ गये थे। देखिए