पन्द्रह
पुकारका देशने जिस उत्साहसे उत्तर दिया, उसे देखकर गांधीजी भी चमत्कृत हुए । उन्होंने आत्मकथामें उन दिनोंके उत्साहका तटस्थ भावसे वर्णन किया है । शुरू-शुरू में आन्दोलन थोड़ा पिछड़ता-सा लगा, किन्तु बादमें उसमें गति आ गई और वह आन्दोलन ब्रिटिश शासन कालका पहला जन-आन्दोलन हुआ और गांधीजी पहले जन-नेता ।
आत्मकथाका विवरण यहाँ आकर समाप्त हो जाता है । किन्तु यह कहानीका अन्त नहीं है । आत्मकथा भी यहीं समाप्त नहीं होती। गांधीजीने आत्मकथाके 'विदाई' नामक अध्यायमें अपने जीवन के अनुभवोंका सिंहावलोकन किया है और उससे ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय जिस आत्मविश्वासके साथ उन्होंने एक वर्षमें स्वराज्य लानेका वचन देते हुए जैसा राष्ट्रीय आन्दोलन छेड़ा था, वह आत्मविश्वास उनके पास नहीं था । आत्मकथाके प्रारम्भिक और अन्तिम दोनों अध्यायोंमें लेखकने पार्थिव विफलताका अनुभव किया है, किन्तु इस विफलता के माध्यमसे उसने आत्मोन्नति की है । १९२० में असहयोग आन्दोलन शुरू करनेके बाद वे दो तत्वोंको लेकर बहुत दुःखी थे। एक ओर तो थी जनताको बीच-बीचमें फूट पड़नेवाली हिंसा और दूसरी ओर था देशके करोड़ों लोगोंको असहनीय गरीबीमें रखनेवाला विदेशी शासन । मार्च १९२२ में अहमदाबाद के न्यायालय में दिये गये अपने बयानमें उन्होंने न्यायाधीशसे कहा : " मेरा पूरा बयान सुनकर आपको शायद इस बातका अन्दाज हो जायेगा कि मेरे भीतर ऐसा क्या कुछ उमड़ रहा है, जिसके कारण एक अच्छा भला आदमी बड़ेसे बड़ा खतरा मोल लेनेको तैयार हो जाता है ।" (खण्ड २३, पृष्ठ १२४)
यरवदाके कारावास कालमें गांधीजीको व्यवस्थित रूपसे अध्ययन और विचार करनेका समय मिल गया। फरवरी १९२४ में बाहर निकलते-निकलते तक उन्होंने रचनात्मक कार्यक्रमको साधन बनाकर कांग्रेस में पुनर्जीवनका संचार करनेका निश्चय कर लिया था। बाहर निकलकर जब खादी के प्रश्न पर वे मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजनदास जैसे प्रभावशाली नेताओंको अपने विचारसे सहमत नहीं करा पाये और जब मोतीलाल नेहरूको उन्होंने जरा भी झुकनेके लिए तैयार नहीं देखा, तो उन्होंने कांग्रेसकी बागडोर स्वराज्य पार्टीके हाथमें दे दी और १९२५ के अन्तमें सक्रिय राजनीतिसे अलग हो गये । उसके बाद एक वर्षका समय उन्होंने लगभग साबरमती आश्रम में बिताया और इस अवधि में गोताका अध्ययन तथा आश्रमवासियोंसे विचार- विमर्श करते रहे । (खण्ड ३२) इस कालमें उन्होंने निष्काम कर्म करने और अपनेको शून्य बनानेका अर्थ अधिक सूक्ष्मतासे समझा । आत्मशुद्धिको दिशामें अपने आराध्यदेव, रामते उन्होंने शक्ति देनेकी प्रार्थना की। उन्होंने 'नवजीवन' के एक लेखमें लिखा है : " वह तो मेरे ही घरमें निवास करनेके लिए आ गया है। वही मेरा सर्वस्व है ।... मैं तो उसीके जिलाये जी रहा हूँ। मैं तो भंगी और ब्राह्मणमें रामको ही देखता हूँ और इसलिए दोनोंका अभिवादन करता हूँ ।" (खण्ड २४, पृष्ठ