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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१९१

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

७. ब्रह्मचर्य―१

अब ब्रह्मचर्यके विषय में विचार करने का समय आ गया है। एकपत्नी- व्रतका तो विवाह के समय से ही मेरे हृदयमें स्थान था। पत्नीके प्रति वफादारी मेरे सत्यव्रतका अंग था। पर अपनी स्त्रीके साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, इसका स्पष्ट बोध मुझे दक्षिण आफ्रिकामें ही हुआ। किस प्रसंगसे अथवा किस पुस्तकके प्रभावसे यह विचार मेरे मनमें उत्पन्न हुआ, सो आज मुझे स्पष्ट याद नहीं आता। इतना स्मरण है कि इसमें रायचन्दभाईके प्रभावकी प्रधानता थी। उनके साथके एक संवादका मुझे स्मरण है। एक बार में ग्लैडस्टनके प्रति श्रीमती ग्लैडस्टनके प्रेमकी प्रशंसा कर रहा था। मैंने कहीं पढ़ा था कि पार्लियामेंटकी सभा में भी श्रीमती ग्लैडस्टन अपने पतिको चाय बनाकर पिलाती थीं। इस बातका पालन इस नियम-बद्ध दम्पतीके जीवनका एक नियम बन गया था। मैंने कविको वह प्रसंग पढ़कर सुनाया और उसके सन्दर्भ में दम्पती-प्रेमकी स्तुति की। रायचन्दभाई बोले, “इसमें तुम्हें महत्वकी कौन-सी बात मालूम होती है? श्रीमती ग्लैडस्टनका पत्नीत्व या उनका सेवाभाव? यदि वे ग्लैडस्टनकी बहन होतीं तो? अथवा उनकी वफादार नौकरानी होतीं और उतने ही प्रेमसे चाय देती तो? ऐसी बहनों, ऐसी नौकरानियोंके दृष्टान्त क्या हमें आज नहीं मिलते? और, नारी-जातिके बदले ऐसा प्रेम यदि तुमने नर-जातिमें देखा होता, तो क्या तुम्हें सानन्द आश्चर्य न होता? मेरे इस कथनपर विचार करना।”

रायचन्दभाई स्वयं विवाहित थे। याद पड़ता है कि उस समय तो मुझे उनके ये वचन कठोर लगे थे, पर इन वचनोंने मुझे चुम्बककी तरह पकड़ लिया। मुझे लगा कि पुरुष-सेवककी ऐसी स्वामि भक्तिका मूल्य पत्नीकी पति-निष्ठाके मूल्यसे हजार गुना अधिक है। पति-पत्नी में ऐक्य होता है, इसलिए उनमें परस्पर प्रेम हो तो कोई आश्चर्य नहीं। मालिक और नौकरके बीच वैसा प्रेम प्रयत्नपूर्वक विकसित करना होता है। दिन-पर-दिन कविके वचनोंका बल मेरी दृष्टिमें बढ़ता प्रतीत हुआ।

मैंने अपने-आपसे पूछा, मुझे पत्नीके साथ कैसा सम्बन्ध रखना चाहिए? पत्नीको विषय-भोगका वाहन बनाने में पत्नीके प्रति वफादारी कहाँ रहती है? जब तक मैं विषय-वासनाके अधीन रहता हूँ, तब तक मेरी वफादारीका मूल्य साधारण ही माना जायेगा। यहाँ मुझे यह कहना चाहिए कि हमारे आपसके सम्बन्धमें पत्नीकी ओरसे कभी आक्रमण हुआ ही नहीं। इस दृष्टिसे मैं जब चाहता तभी मेरे लिए ब्रह्मचर्य का पालन सुलभ था। मेरी अशक्ति अथवा आसक्ति ही मुझे रोक रही थी।

जाग्रत होनेके बाद भी दो बार तो मैं विफल ही रहा। प्रयत्न करता परन्तु गिर पड़ता। प्रयत्नमें मुख्य उद्देश्य ऊँचा नहीं था। मुख्य उद्देश्य था, सन्तानोत्पतिको रोकना। उसके बाह्य उपचारोंके बारेमें मैंने विलायतमें कुछ पढ़ा था। डा॰ एलिन्सनके इन उपायोंके प्रचारका उल्लेख मैं अन्नाहार- विषयक प्रकरण मैं कर चुका हूँ। उसका थोड़ा और क्षणिक प्रभाव मुझपर पड़ा था। पर श्री हिल्सने उसका जो विरोध किया था और आन्तरिक साधनके―संयमके―समर्थनमें जो कहा था, उसका