सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/१९२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१६०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

प्रभाव मुझ पर बहुत अधिक पड़ा, और अनुभवसे वह चिरस्थायी बन गया। इसलिए सन्तानोत्पत्तिकी अनावश्यकता ध्यानमें आते ही मैंने संयम-पालनका प्रयत्न शुरू कर दिया। संयम-पालनकी कठिनाइयोंका पार न था। हमने अलग-अलग खाटें रखीं। रात में पूरी तरह थकनेके बाद ही सोनेका प्रयत्न किया। इस सारे प्रयत्नका विशेष परिणाम मैं तुरन्त नहीं देख सका। पर भूतकाल पर आज निगाह डालते हुए देखता हूँ कि इन सब प्रयत्नोंने मुझे अन्तिम निश्चयका बल दिया।

अन्तिम निश्चय तो मैं सन् १९०६ में ही कर सका। उस समय सत्याग्रहका आरम्भ नहीं हुआ था। मुझे उसका सपना तक नहीं आया था। बोअर युद्धके बाद नेटालमें जुलू ‘विद्रोह’ हुआ। उस समय मैं जोहानिसबर्ग में वकालत करता था। पर मैंने अनुभव किया कि इस ‘विद्रोह’ के मौके पर भी मुझे अपनी सेवा नेटाल सरकारको अर्पण करनी चाहिए। मैंने सेवा अर्पण की और वह स्वीकृत हुई। उसका वर्णन आगे आयेगा। पर इस सेवाके सिलसिले में मेरे मनमें संयम-पालनके तीव्र विचार उत्पन्न हुए। अपने स्वभावके अनुसार मैंने साथियोंसे इसकी चर्चा की। मैंने अनुभव किया कि सन्तानोत्पत्ति और सन्तानका लालन-पालन सार्वजनिक सेवाके विरोधी हैं। इस ‘विद्रोह’ में सम्मिलित होनेके लिए मुझे जोहानिसबर्गकी अपनी गृहस्थी उजाड़ देनी पड़ी थी। टीम-टामसे बसाये गये घरका और साज-सामानका, जिसे बिसाये मुश्किलसे एक महीना हुआ होगा, मैंने त्याग कर दिया। पत्नी और बच्चोंको फीनिक्स में रख दिया और मैं डोली उठानेवालोंकी टुकड़ी लेकर निकल पड़ा। कठिन कूच करते हुए मैंने देखा कि यदि मुझे लोकसेवामें ही तन्मय हो जाना हो, तो पुत्रेष्णा और विषयेष्णाका त्याग करना चाहिए और वानप्रस्थ-धर्म पालना चाहिए।

‘विद्रोह’ में तो मुझे डेढ़ महीनेसे अधिक समय नहीं देना पड़ा, पर छ: हफ्तोंका यह समय मेरे जीवनका अत्यन्त मूल्यवान समय था। इस समय मैंने व्रतके महत्वको अधिक-से-अधिक समझा। मैंने देखा कि व्रत बन्धन नहीं, बल्कि स्वतन्त्रताका द्वार है। आज तक मुझे अपने प्रयत्नोंमें जितनी चाहिए उतनी सफलता न मिलनेका कारण यह है कि मैं दृढनिश्चयो नहीं था। मुझे अपनी शक्ति पर अविश्वास था। ईश्वरकी कृपा पर अविश्वास था, और इस कारण मेरा मन अनेक तरंगों और अनेक विकारोंके चक्कर में पड़ा रहता था। मैंने देखा कि व्रत-बद्ध न होनेसे मनुष्य मोहमें पड़ता है। व्रतसे बँधना व्यभिचारसे छुटकारा पाकर एकपत्नी व्रतका पालन करनेके समान है। “मैं प्रयत्न करनेमें विश्वास रखता हूँ, व्रतसे बँधना नहीं चाहता” यह वचन निर्बलताकी निशानी है, और इसमें सूक्ष्म रूपसे भोगकी वासना छिपी होती है। जो वस्तु त्याज्य है, उसका सर्वथा त्याग करनेमें हानि कैसे हो सकती है? जो साँप मुझे डसनेवाला है, उसका त्याग में निश्चय-पूर्वक करता हूँ, त्यागका केवल प्रयत्न नहीं करता। मैं जानता हूँ कि केवल प्रयत्नके भरोसे रहने में मृत्यु निहित है। प्रयत्नमें साँपकी विकरालताके स्पष्ट ज्ञानका अभाव है। इसी तरह जिस वस्तुके त्यागका हम केवल प्रयत्न करते हैं उस वस्तुके त्यागके औचित्यके बारेमें हमें स्पष्ट दर्शन नहीं हुआ है, यह सिद्ध होता है। ‘आगे चलकर मेरे विचार बदल जायें तो?’ ऐसी शंका करके प्रायः हम व्रत