घरकी धुलाई धोबीकी धुलाईसे जरा भी घटिया नहीं होती थी। कालरका कड़ापन और चमक धोबीके धोये कालरसे कम न रहती थी।
जब गोखले दक्षिण आफ्रिका आये, उनके पास स्व० महादेव गोविन्द रानडेकी प्रसादी-रूप एक दुपट्टा था। गोखले उस दुपट्टेको अतिशय जतनसे रखते थे और विषेष अवसर पर ही उसका उपयोग करते थे। जोहानिसबर्ग में उनके सम्मानमें जो भोज दिया गया था, वह एक महत्वपूर्ण अवसर था। उस अवसर पर उन्होंने जो भाषण दिया वह दक्षिण आफ्रिकामें उनका सबसे बड़ा भाषण था। उस अवसर पर वे उक्त दुपट्टेका उपयोग करना चाहते थे। उसमें सिलवटें पड़ी हुई थीं, और उसपर इस्तरी करनेकी जरूरत थी। धोबीका पता लगाकर उससे तुरन्त इस्तरी कराना सम्भव न था। मैंने अपनो कलाका उपयोग करने देनेकी अनुमति गोखलेसे चाही।
“मैं तुम्हारी वकालतका तो विश्वास कर लूँगा, पर इस दुपट्टे पर तुम्हें अपनी धोबी-कलाका उपयोग नहीं करने दूँगा। इस दुपट्टे पर तुम दाग लगा दो तो? इसकी कीमत तुम जानते हो?” यों कहकर अत्यन्त उल्लाससे उन्होंने प्रसादी की कथा मुझे सुनाई।
मैंने फिर विनती की और दाग न पड़ने देनेकी जिम्मेदारी ली। मुझे इस्तरी करने की अनुमति मिली। और अपनी कुशलताका प्रमाण-पत्र मुझे मिल गया! अब दुनिया मुझे प्रमाण-पत्र न दे तो भी क्या?
जिस तरह मैं धोबीको गुलामी से छूटा, उसी तरह नाईकी गुलामीसे भी छूटनेका अवसर आ गया। दाढ़ी तो विलायत जानेवाले सभी लोग हाथसे बनाने सीख ही लगते हैं, पर कोई वाल छाँटना भी सीखता होगा, इसका मुझे ख्याल नहीं है। एक बार प्रिटोरिया में मैं एक अंग्रेज हज्जामकी दुकान पर पहुँचा। उसने मेरी हजामत बनानेसे साफ इन्कार कर दिया, और इन्कार करते हुए तिरस्कार प्रकट किया, सो अलग। मुझे दुःख हुआ। मैं बाजार पहुँचा। मैंने बाल काटनेकी मशीन खरीदी और आईने सामने खड़े रहकर बाल काटे। बाल जैसे-तैसे कट तो गये, पर पीछेके बाल काटनेमें बड़ी कठिनाई हुई। सोधे तो कट ही न पाये। कोर्टमें खूब कहकहे लगे।
“तुम्हारे बाल ऐसे क्यों हो गये हैं? सिर पर चूहे तो नहीं चढ़ गये थे?”
मैंने कहा: “जो नहीं, मेरे काले सिरको गोरा हज्जाम कैसे छू सकता है? इसलिए कैसे भी क्यों न हों, अपने हाथसे काटे हुए बाल मुझे अधिक प्रिय हैं।”
इस उत्तरसे मित्रोंको आश्चर्य नहीं हुआ।
असल में उस हज्जामका कोई दोष न था। अगर वह काली चमड़ीवालोंके बाल काटने लगता तो उसकी रोजी मारी जाती। हम भी अपने अछूतोंके बाल ऊँची जातिके हिन्दुओंके हज्जामोंको कहाँ काटने देते हैं?[१] दक्षिण आफ्रिकामें मुझे इसका बदला एक नहीं, बल्कि अनेकों बार मिला है; और चूँकि मैं यह मानता था कि यह हमारे दोषका परिणाम है, इसलिए मुझे इस बातसे कभी गुस्सा नहीं आया।
स्वावलम्बन और सादगीके मेरे शौकने आगे चलकर जो तीव्र स्वरूप धारण किया, यथास्थान उसका वर्णन करूँगा। इस चीजकी जड़ तो मेरे अन्दर शुरूसे ही
- ↑ हले यह परिस्थिति थी।