सोलह
२०१-२) गांधीजीने सत्यके जो अनन्त प्रयोग किये, उनकी मानो यह फलश्रुति थी । राम-नाम में अपने विश्वासके कारण ही वे जीवनके अन्तिम दो वर्षोंमें, जो निराशाके घोर अन्धकारसे ढँके हुए थे, अविचलित बने रहे और उसीके बल पर उन्होंने मृत्युका उसी भावसे वरण किया जिस भावसे वे करना चाहते थे ।
आध्यात्मिक क्षेत्रमें किये गये इन प्रयोगोंने गांधीजीको आन्तरिक शक्ति दी, आत्मज्ञानकी दिशा में उनका विकास किया और राजनीतिके क्षेत्रमें भी उन्होंने जो- कुछ किया उसका मूल स्रोत भी यही प्रयोग थे । (पृष्ठ ३) राजनीतिक क्षेत्रमें इस शक्तिका स्वरूप था साधारण स्त्रियों और पुरुषोंको स्वार्थसे ऊपर उठनेकी प्रेरणा देना, लोगों में पड़ी हुई वीरता और अच्छाईको सर्वसाधारणको भलाईके काममें लगा देना । गांधीजी के लम्बे राजनीतिक जीवनमें उनकी शक्तिका आधार सदा ऐसे आदमियोंका अन्तःस्फूर्त प्रेरित काम ही रहा जो प्रेम, आशा और उत्साहकी भावना लेकर सामने आये थे। अपनी जेल डायरी में (खण्ड २३, पृष्ठ १६२) उन्होंने बोहिमेको उद्धृत किया है : " यदि प्राणियों पर तेरा दावा अपनी आन्तरिक प्रकृतिके सत्य और आन्तरिक आधार पर न होकर बाहरी और सतही है तो तेरी इच्छा और तेरा दावा पाशविक वस्तु है ।" गांधीजी जनताको आदेश देते ही रहते थे, किन्तु इन आदेशोंका आधार उनके नेतृत्वका स्वेच्छापूर्वक स्वीकार कर लिया जाना था। गांधीजी किसी बाहरी शक्तिके बल पर नेतागीरी नहीं करते थे, तथापि इतिहासने किसी और व्यक्तिके आदर्शों पर इतनी बड़ी संख्या में लोगोंको चलते हुए नहीं देखा । यदि धर्मका जागृत आचरण किसी व्यक्ति के नैतिक अस्तित्वका विकास करता है, उसे बल देता है और यदि उसमें ऐसी शक्ति आ जाती है कि राजनीतिक क्षेत्रमें लोगोंकी आन्तरिक सद्भावनाको शक्तिके रूप में व्यवहृत कर सके, तो ये प्रयोग जिनका उद्देश्य स्वर्गको धरती पर उतारना था, जो गुफा में निहित धर्मको खुले में लाना चाहते थे और जो सार्वजनिक चौक और मैदानको भी मन्दिर बनानेकी इच्छा रखते थे, निःसन्देह करणीय थे और किसी भी जमाने में उनकी अवज्ञा नहीं की जा सकती ।